नई दिल्ली, 6 जुलाई 2026। अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद देशभर में नई बहस शुरू हो गई है। फिल्म के हटने के पीछे आधिकारिक तौर पर विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन सूत्रों के अनुसार फिल्म के कुछ हिस्सों को लेकर ऐसी आशंका जताई गई कि उनका दुरुपयोग भारत विरोधी तत्वों द्वारा किया जा सकता है। इसी कारण सावधानी बरतते हुए फिल्म को फिलहाल भारत में उपलब्ध सूची से हटा दिया गया है।
यह फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से बनाई गई थी और पिछले कई वर्षों से रिलीज़ का इंतजार कर रही थी। सिनेमाघरों में रिलीज़ की अनुमति न मिलने के बाद इसे हाल ही में नए नाम ‘सतलुज’ के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ किया गया था। हालांकि रिलीज़ के कुछ ही समय बाद इसे दर्शकों के लिए अनुपलब्ध कर दिया गया।
सूत्रों का कहना है कि फिल्म में दिखाए गए कुछ संवेदनशील प्रसंगों को लेकर समीक्षा की गई थी। संबंधित पक्षों का मानना था कि यदि इन दृश्यों को बिना किसी अतिरिक्त संदर्भ के प्रसारित किया गया तो भविष्य में उनका गलत अर्थ निकाला जा सकता है। इसी आधार पर प्लेटफॉर्म ने फिल्म को अस्थायी रूप से हटाने का फैसला लिया।
इस बीच, ओटीटी प्लेटफॉर्म ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि वह फिल्म और उसके रचनात्मक दृष्टिकोण का सम्मान करता है। कंपनी का कहना है कि सार्थक और प्रभावशाली कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाना उसकी प्राथमिकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि कानूनी और नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर काम किया जाएगा।
फिल्म हटने के बाद दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने फिल्म से जुड़ी एक तस्वीर पोस्ट करते हुए प्रतीकात्मक संदेश लिखा और संकेत दिया कि वह अपनी बात पर कायम हैं। बाद में लाइव प्रसारण के दौरान उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में किसी सामग्री को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं है और उन्होंने पंजाब के प्रति अपने जुड़ाव को दोहराया।
फिल्म के हटाए जाने पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। विभिन्न दलों के नेताओं ने इस फैसले पर अलग-अलग राय व्यक्त की है। कुछ नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय बताया, जबकि अन्य का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़े मामलों में सभी पक्षों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
‘सतलुज’ की कहानी पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष से प्रेरित बताई जाती है। उन्होंने 1980 और 1990 के दशक के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़े मामलों को सार्वजनिक करने का प्रयास किया था। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को फिल्म की कहानी का आधार बनाया गया है।
बताया जाता है कि फिल्म को वर्ष 2022 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास थिएटर रिलीज़ के लिए भेजा गया था। उस समय फिल्म में कई संशोधनों का सुझाव दिया गया था, जिसके बाद इसकी रिलीज़ लंबे समय तक टलती रही। अंततः निर्माताओं ने इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने का निर्णय लिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री के लिए थिएटर जैसी पूर्व सेंसर प्रक्रिया अनिवार्य नहीं होती, लेकिन प्लेटफॉर्म को स्वयं नियामकीय दिशानिर्देशों का पालन करना पड़ता है। यदि किसी सामग्री को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या संवेदनशील सामाजिक मुद्दों से जुड़ी चिंताएं सामने आती हैं, तो उसकी समीक्षा की जा सकती है।
फिलहाल ‘सतलुज’ भारत में उपलब्ध नहीं है। दर्शकों और फिल्म उद्योग की नजर अब इस बात पर है कि संबंधित प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद क्या फिल्म दोबारा ओटीटी प्लेटफॉर्म पर लौटेगी या नहीं। आने वाले दिनों में इस मामले में और स्पष्टता आने की संभावना है।








