नई दिल्ली, 6 जुलाई 2026। तमिलनाडु के चर्चित करूर भगदड़ मामले में एक नया कानूनी मोड़ सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर जल्द सुनवाई करने पर सहमति जताई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मामले की जांच के दौरान कुछ प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियां गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास कर रही हैं। याचिका में गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है, ताकि केंद्रीय जांच एजेंसी की जांच निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से आगे बढ़ सके।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ के समक्ष हुई। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार करते हुए मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने का फैसला लिया। याचिका में कहा गया है कि जिन लोगों के खिलाफ जांच चल रही है, वे अब राज्य सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर हैं और उनकी सार्वजनिक गतिविधियां जांच को प्रभावित कर सकती हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि इस मामले की जांच पहले ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जा चुकी है। ऐसे में यदि गवाहों पर किसी प्रकार का दबाव या प्रभाव पड़ता है, तो इससे पूरी जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। इसी कारण अदालत से गवाहों की सुरक्षा और जांच प्रक्रिया को स्वतंत्र बनाए रखने की मांग की गई है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि राज्य सरकार द्वारा करूर में मृतकों के परिजनों के लिए राहत और सहायता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह चिंता व्यक्त की कि जिन परिवारों को सहायता दी जा रही है, उनमें कई लोग जांच के महत्वपूर्ण गवाह भी हैं। उनका कहना है कि राहत देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन जांच पूरी होने तक गवाहों और जांच से जुड़े व्यक्तियों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को लेकर सावधानी बरतना आवश्यक है।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि सितंबर 2025 की उस दुखद घटना से जुड़ी है, जब करूर जिले में एक बड़े राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान भारी भीड़ के कारण भगदड़ मच गई थी। इस हादसे में 41 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे। घटना के बाद पूरे राज्य में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर सवाल उठे थे।
हादसे के बाद मामले की जांच पहले राज्य पुलिस ने शुरू की थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसे सीबीआई को सौंप दिया गया। जांच एजेंसी ने कार्यक्रम के आयोजन, भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारियों से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच शुरू की। इस दौरान कई अधिकारियों, आयोजकों और संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ भी की गई।
मामले को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। एक पक्ष का कहना है कि कार्यक्रम के आयोजन में लापरवाही और समन्वय की कमी के कारण यह हादसा हुआ, जबकि दूसरा पक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। राजनीतिक बयानबाजी के बीच अब सुप्रीम कोर्ट में दायर नई याचिका ने मामले को एक अलग कानूनी दिशा दे दी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी आपराधिक जांच में गवाहों की सुरक्षा और स्वतंत्र बयान बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि अदालत को यह लगता है कि गवाहों पर प्रभाव डालने की आशंका है, तो वह आवश्यक सुरक्षा संबंधी निर्देश जारी कर सकती है। इससे जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने में मदद मिलती है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत यह तय करेगी कि गवाहों की सुरक्षा, जांच की निष्पक्षता और राजनीतिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए आगे कौन-कौन से निर्देश आवश्यक हैं। इस फैसले का असर न केवल करूर भगदड़ मामले की जांच पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों की जांच प्रक्रिया के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।








