पतंजलि में शास्त्र शुद्धि अभियान का ऐलान, 52वें प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ

पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ

पतंजलि में शास्त्र शुद्धि अभियान का ऐलान, 52वें प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ

हरिद्वार: भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन शास्त्रों के प्रामाणिक अध्ययन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। तीन दिवसीय इस सम्मेलन का उद्घाटन उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कार्यक्रम में योगगुरु स्वामी रामदेव, पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण और देश-विदेश से आए विद्वान शामिल हुए। सम्मेलन में 23 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की मौजूदगी भी रही।

कार्यक्रम के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन और सनातन संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। स्वामी रामदेव ने पतंजलि के माध्यम से सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान शुरू करने की घोषणा की।

भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर राज्यपाल ने दिया जोर

राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं, बल्कि मनुष्य में विवेक, समाज में सद्भाव और संपूर्ण सृष्टि के प्रति कल्याणकारी दृष्टि विकसित करना भी है।

उन्होंने कहा कि व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, योग और दर्शन जैसे क्षेत्रों में भारतीय मनीषियों का योगदान देश की समृद्ध बौद्धिक विरासत को दर्शाता है। ऐसे सम्मेलनों से प्राचीन ज्ञान के संरक्षण और वर्तमान समय में उसकी उपयोगिता को समझने का अवसर मिलता है।

पतंजलि से शुरू होगा सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान

स्वामी रामदेव ने कहा कि भारतीय शास्त्रों और सनातन धर्म से जुड़े प्रसंगों की गलत व्याख्याओं को लेकर गंभीर अध्ययन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिव और ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों को समझने के लिए मूल ग्रंथों का प्रामाणिक अध्ययन और शास्त्रीय दृष्टिकोण जरूरी है।

उन्होंने घोषणा की कि पतंजलि के माध्यम से सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान को आगे बढ़ाया जाएगा। इस अभियान के तहत प्राचीन ग्रंथों में कथित रूप से जोड़ी गई सामग्री, प्रक्षेप और मूल ऋषि चिंतन से संबंधित विषयों का विद्वानों के सहयोग से परीक्षण किया जाएगा।

स्वामी रामदेव ने बताया कि 30 अक्टूबर को देश के संतों, अखाड़ों, शंकराचार्यों, रामानुजाचार्यों, रामानंदाचार्यों और विभिन्न विद्वत संस्थाओं के प्रतिनिधियों के मार्गदर्शन में अभियान को आगे बढ़ाने पर चर्चा होगी।

उन्होंने कहा, “हम वेदों को जीने वाले हैं, हमारे भीतर रामत्व, कृष्णत्व और शिवत्व है।” स्वामी रामदेव ने सामाजिक समरसता पर भी जोर दिया और कहा कि मनुष्य की पहचान जातिगत विभाजन से नहीं, बल्कि उसके कर्म और सेवा भाव से होनी चाहिए।

उन्होंने भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का संकल्प भी दोहराया।

सनातन के गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प: आचार्य बालकृष्ण

पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं है, बल्कि सनातन के गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करने के संकल्प का प्रारंभ है।

उन्होंने कहा कि सम्मेलन में संस्कृति, शास्त्र और समकालीन समय के साथ-साथ प्राचीन ग्रंथों में हुए वैचारिक बदलावों और कथित विकृतियों पर भी विमर्श किया जाएगा। आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों का समाधान प्रामाणिक शोध और शास्त्रीय चर्चा के माध्यम से किया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि स्वामी रामदेव के नेतृत्व में पतंजलि भारतीय ज्ञान परंपरा, आयुर्वेद, योग और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्रों में कार्य कर रहा है। आधुनिक विज्ञान और सनातन की प्रज्ञा के समन्वय से राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

शास्त्र शुद्धि अभियान

प्राच्य विद्या से भारत विद्या की ओर बढ़ने का आह्वान

सम्मेलन के अध्यक्ष और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए भारतीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखने की बात कही।

उन्होंने ऑल इंडिया ओरिएंटल कॉन्फ्रेंस के नाम में ‘ओरिएंटल’ के स्थान पर ‘प्राच्य विद्या’ के प्रयोग और आगे ‘भारत विद्या’ की व्यापक अवधारणा विकसित करने का प्रस्ताव रखा।

अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद की महासचिव प्रो. कविता होले ने कहा कि परिषद भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य, दर्शन, इतिहास, धर्म, अभिलेखों और पांडुलिपियों के व्यवस्थित अध्ययन तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित करती है।

पुस्तकों का विमोचन और पुस्तक मेले का उद्घाटन

कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने ‘भारतीय दर्शनों का इतिहास एवं मीमांसा’, ‘वेदामृत’ और ‘भारतीय दर्शन बोध’ पुस्तकों का विमोचन किया। इसके साथ ही पुस्तक मेले का उद्घाटन भी किया गया।

मेले में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य, दर्शन, वैदिक वाङ्मय, आयुर्वेद और प्राच्य विद्या से संबंधित पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया।

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सम्मेलन में होंगे शोध-पत्र और विद्वत विमर्श

29 से 31 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस सम्मेलन में पूर्ण सत्रों, विशेष पैनल चर्चाओं, शोध-पत्र प्रस्तुतियों और पोस्टर प्रस्तुतियों का आयोजन किया जा रहा है। महर्षि पतंजलि सभा और ब्रह्मवादिनी सभा के समानांतर सत्र भी आयोजित होंगे।

संस्कृत, वेद, दर्शन, इतिहास, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर देश-विदेश के विद्वान अपने शोध और विचार प्रस्तुत करेंगे। सम्मेलन का उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान-विरासत के प्रामाणिक अध्ययन को प्रोत्साहित करना और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा तथा अनुसंधान से जोड़ना है।

कार्यक्रम में भारतीय विद्वत परिषद के अध्यक्ष आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी, श्री गणेश उमाकांत थीटे, प्रो. शिवानी, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया, मानवीकि संकायाध्यक्ष मयंक अग्रवाल सहित कई विद्वान, शिक्षाविद्, संत, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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