-सनातन के गौरव का संकल्प लेकर स्वामी रामदेव ने जोड़ी संतों की शक्ति, आचार्य बालकृष्ण ने किया पुरुषार्थ
हरिद्वार के पतंजलि विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन में तीन दिनों के दौरान जो कुछ हुआ, वह केवल एक धार्मिक या अकादमिक आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीय सनातन चेतना का वह महामंथन था जिसकी गूंज इतिहास के पन्नों में अमर हो गई है। सदियों से सनातन परंपरा, उसके ग्रंथों और मान्यताओं पर सवाल उठते रहे हैं, आक्षेप लगते रहे हैं।
कभी विदेशी आक्रांताओं ने तो कभी मैकाले की शिक्षा पद्धति ने इसे कमजोर करने के षड्यंत्र रचे और आधुनिक दौर में तो स्थिति यह हो गई कि एआई टूल्स और चैटजीपीटी के जरिए हमारे देवी-देवताओं और ग्रंथों को लेकर ऐसे कुप्रचार फैलाए जाने लगे जो सीधे हमारी आस्था पर प्रहार थे। लेकिन इन सबके खिलाफ खुलकर एक मंच पर खड़े होने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था।
वजह साफ थी कि संत समाज की अपनी एक विशिष्ट और स्वतंत्र तासीर है। अलग-अलग पंथ, भिन्न-भिन्न अखाड़े, मठ, पीठ और अनगिनत गुरु परंपराएं, इन सबकी अपनी मान्यताएं और शैलियां रही हैं। संत समाज को किसी एक साझा मंच पर लाना कितना दुरूह और असंभव सा कार्य है, इसका जीवंत उदाहरण सम्मेलन में खुद एक संत के उस रोचक कथन से मिला जिसमें उन्होंने कहा कि एक संत को लाना भी एक हाथी को लाने के बराबर है। इस एक वाक्य में उस विशाल चुनौती का पूरा सच छिपा था जहां मत-मतांतरों के दिग्गजों को एक साथ लाना लोहे के चने चबाने जैसा था।
Patanjali Prachya Vidya Sammelan: सनातन के गौरव के लिए संतों का महासंगम
किंतु इस असंभव से दिखने वाले काम को मुमकिन कर दिखाया योगऋषि स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की जोड़ी ने। स्वामी रामदेव ने इस चुनौती को सिर्फ चिंता का विषय नहीं बनाया, बल्कि इसे एक बड़े संकल्प में बदला। उन्होंने साफ कर दिया कि अब चुप बैठने का वक्त नहीं है और देश की तमाम संत परंपराओं को सनातन के गौरव के लिए एक साझा संकल्प के साथ आगे आना होगा। लेकिन इस सोच को जमीन पर उतारना अपने आप में एक पहाड़ जैसा काम था। देश के कोने-कोने में बैठे अखाड़ों के संतों, शंकराचार्यों और धर्माचार्यों तक पहुंचना, उनसे संवाद करना और उनके बीच अविश्वास की दीवारों को गिराकर विश्वास का एक मजबूत सेतु तैयार करना, यह कठिन दायित्व आचार्य बालकृष्ण ने अपने कंधों पर लिया और जब देश के चारों कोनों से संत पतंजलि पहुंचे, तो यह सिर्फ एक आयोजन की सफलता नहीं रह गया था बल्कि यह भारत की सामूहिक सांस्कृतिक शक्ति का एक ऐसा शंखनाद था जिसकी कल्पना करना भी कठिन था। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक और प्रेरणादायक पक्ष तब सामने आया जब इस पहल का श्रेय स्वामी रामदेव को दिए जाने की बात उठी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें इसका लेशमात्र भी श्रेय नहीं चाहिए, उन्हें केवल इतना चाहिए कि सनातन का गौरव लौटे और संत समाज का सम्मान पुनर्स्थापित हो। पहल उन्होंने की, राह उन्होंने दिखाई, लेकिन बड़प्पन यह रहा कि उन्होंने सारा श्रेय अंततः पूरे संत समाज को समर्पित कर दिया।
यह महासम्मेलन केवल भाषणों और तालियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सनातन के भविष्य के लिए एक ठोस और ऐतिहासिक कार्ययोजना को जन्म दिया। संतों और धर्माचार्यों की सर्वसम्मति से ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ के गठन का जो निर्णय हुआ, वह इस सदी का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम है। इसके अंतर्गत दो प्रमुख परिषदों की रूपरेखा बनाई गई। एक तरफ विद्वत परिषद जो केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी के नेतृत्व में वेदों, पुराणों और शास्त्रों में समय के साथ हुई कथित मिलावट और विकृतियों का वैज्ञानिक और प्रामाणिक अध्ययन करेगी और दूसरी तरफ आचार्य महासभा के स्वामी परमात्मानंद के संयोजकत्व में संत-संन्यासी परिषद जो इन निष्कर्षों का परीक्षण कर अंतिम मार्गदर्शन देगी। इस समिति में सिख, जैन और बौद्ध परंपराओं के मनीषियों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया गया है, जो यह साबित करता है कि यह पहल किसी एक संप्रदाय की नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय चेतना की रक्षा का रक्षा-कवच है।

इन तीन दिनों में केवल धर्म और शास्त्र शुद्धि पर ही मंथन नहीं हुआ, बल्कि आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को जोड़ने का एक विराट अकादमिक यज्ञ भी चला। देश के 26 राज्यों से लगभग 1,800 प्रतिभागी, 40 से अधिक संत और 90 से अधिक मूर्धन्य विद्वान इस महाकुंभ में उपस्थित हुए। 23 विषय वर्गों में शोधपत्र प्रस्तुत किए गए जहां ‘कुंभ रहस्यम्’, ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’, ‘भारतीय अनुसंधान पद्धति’, ‘बाल साहित्य’ और ‘प्राच्य विद्या का पुनरावलोकन’ जैसे पांच नए शोध विषयों पर गहन चर्चा हुई। इस अवसर पर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा लिखित वैज्ञानिक ग्रंथ ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ का विमोचन हुआ, 35 पुस्तकों के लोकार्पण के साथ 92 स्टॉलों के माध्यम से प्राचीन संस्कृत साहित्य को सामने लाया गया और कुलपतियों के सम्मेलन ने यह मार्ग प्रशस्त कर दिया कि अब देश के विश्वविद्यालय आधुनिक शिक्षा के साथ हमारी मूल ज्ञान परंपरा को भी अपनी मुख्यधारा बनाएंगे।
आज जब हम इस पूरे घटनाक्रम को देखते हैं तो इसके मायने बहुत गहरे और दूरगामी नजर आते हैं। अब तक सनातन पर हमले होते थे और हम केवल बचाव की मुद्रा में आ जाते थे या सोशल मीडिया पर अपनी असहमति जताकर शांत हो जाते थे। पतंजलि के इस महासम्मेलन ने उस रक्षात्मक और लाचारी भरे दौर को हमेशा के लिए दफना दिया है।
अब लड़ाई केवल भावनाओं की नहीं, बल्कि अकादमिक ताकत, प्रामाणिक शोध और बौद्धिक सुदृढ़ता की है। शंकराचार्यों से लेकर अखाड़ों के शीर्ष संतों का एक मंच पर आकर यह हुंकार भरना कि सनातन अपने मूल स्वरूप में लौटेगा, इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि सनातन अब जाग चुका है। स्वामी रामदेव का अदम्य साहस, आचार्य बालकृष्ण का अथक प्रबंधन और संतों की अटूट इच्छाशक्ति ने मिलकर पतंजलि में जो लकीर खींच दी है, वह आने वाले कई दशकों तक भारत के वैचारिक और सांस्कृतिक भविष्य की दिशा तय करेगी। सचमुच, यहां इतिहास केवल लिखा नहीं गया, बल्कि आंखों के सामने पूरी दुनिया ने इतिहास बनते हुए देखा है।
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