राम से शिव तक: स्वामी रामदेव ने क्यों उठाया सनातन शास्त्र शुद्धि का मुद्दा?

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राम से शिव तक… स्वामी रामदेव के निशाने पर थे सनातन की छवि बिगाड़ने वाले ग्रंथ

28 अक्टूबर को आचार्य बालकृष्ण की मौजूदगी में स्वामी रामदेव के तेवर बेहद तल्ख थे। हालांकि उस दिन, न उनके भीतर कोई राजनीतिक तल्खी थी, न किसी सरकार या व्यवस्था पर सीधा प्रहार। बावजूद इसके, उनके तीखे तेवरों ने देश ही नहीं, दुनिया भर के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया क्योंकि राम, सीता, शिव और कृष्ण के पवित्र चरित्रों पर हो रहे प्रहारों से शुरू हुई वार्ता ‘शास्त्र शुद्धि’ के संकल्प पर आकर ठहर गई। भगवान राम को मांसाहारी और मद्यपान करने वाला बताना, माता सीता को लेकर आपत्तिजनक प्रसंग रचना, भगवान शिव को नशेड़ी और गांजा पीने वाला ठहराना तथा श्रीकृष्ण की रासलीलाओं को विलासिता के चश्मे से दिखाना।

स्वामी रामदेव ने एक-एक कर इन सभी प्रसंगों की परतें उधेड़ीं। उनकी पूरी बात में एक गहरी बेचैनी साफ महसूस हो रही थी। आखिर जिस राम को भारतीय समाज मर्यादा पुरुषोत्तम मानता है, जिस सीता को त्याग और गरिमा का पर्याय माना जाता है, जिस शिव को आदि योगी और वैराग्य का जीवंत स्वरूप पूजा जाता है, और जिस कृष्ण को योगेश्वर मानकर मस्तक झुकाया जाता है, उनके चरित्र को ऐसे कलंकित प्रसंगों से कैसे जोड़ा जा सकता है? उनका साफ कहना था कि यह सब केवल सनातन को बदनाम करने का षड्यंत्र नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मन में उनके अपने ही आराध्यों के प्रति संदेह के बीज बोने का कुत्सित प्रयास है।

लेकिन स्वामी रामदेव केवल इन आपत्तिजनक प्रसंगों पर कोरा रोष प्रकट करने नहीं आए थे। उनकी बात जैसे-जैसे आगे बढ़ी, यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई कि उनके मुख्य निशाने पर वे ग्रंथ, उनमें किए गए कथित प्रक्षेप (मिलावट) और सदियों से चली आ रही वे भ्रामक व्याख्याएं थीं, जिनके दम पर यह सब परोसा गया।

विवाद की असली जड़: शास्त्रों में मिलावट और विदेशी व्याख्याएं

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मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल का हवाला देते हुए स्वामी रामदेव ने बड़ा आरोप लगाया कि सनातन को अंदर से कमजोर करने के लिए उसके अपने ही ग्रंथों में सुनियोजित मिलावट की गई। मनुस्मृति, विभिन्न स्मृति ग्रंथों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और अठारह पुराणों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इनमें ऐसे-ऐसे प्रसंग जोड़ दिए गए, जिनके सहारे सनातन पर स्त्रियों और शूद्रों के अपमान से लेकर देवी-देवताओं के चरित्र हनन तक के झूठे आरोप मढ़े जा सकें।

उन्होंने भगवान राम और माता सीता से जुड़े प्रसंगों का विशेष तौर पर उल्लेख किया। उनका दो टूक कहना था कि वाल्मीकि रामायण तक में ऐसे श्लोक जबरन ठूंस दिए गए हैं, जो राम और सीता के मूल और पवित्र चरित्र से दूर-दूर तक मेल नहीं खाते। स्वामी रामदेव की पूरी दलील का सार यही था कि किसी ग्रंथ में कोई बात लिखी मिल जाने भर से उसे सनातन का अकाट्य सत्य या मूल सिद्धांत नहीं मान लेना चाहिए। हमें मूल पाठ और बाद में जोड़े गए मिलावटी अंशों के बीच का फर्क समझना ही होगा।

इसी कड़ी में उन्होंने मैक्समूलर का विशेष रूप से जिक्र किया। उनका आरोप था कि भारतीय शास्त्रों और संस्कृत के अध्ययन के नाम पर उनकी जानबूझकर ऐसी विकृत व्याख्याएं गढ़ी गईं, जो अंग्रेजी के रास्ते पूरी दुनिया तक पहुंचाई गईं। उन्होंने ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, कैंब्रिज और स्टैनफोर्ड जैसे दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में आज भी वैसी ही भ्रामक व्याख्याओं के पढ़ाए जाने पर गहरी चिंता जताई।

यहां स्वामी रामदेव के मंतव्य का एक बहुत बड़ा फलसफा सामने आता है। उनका कहना सिर्फ यह नहीं था कि हमारे धर्मग्रंथों को गलत तरीके से पेश किया गया है, बल्कि यह था कि जब किसी प्राचीन सभ्यता के मूल ग्रंथों को ही विकृत अर्थों के साथ दुनिया के सामने रखा जाएगा, तो उस पूरी सभ्यता की पहचान भी वैसी ही विकृत बन जाएगी। सनातन को लेकर आज वैश्विक स्तर पर जितनी भी भ्रांतियां फैली हैं, उनकी जड़ वे इसी वैचारिक प्रदूषण में देखते हैं।

जाति और स्त्री पर दो टूक: वर्ण व्यवस्था का असली अर्थ

सनातन पर लगने वाले पारंपरिक आरोपों में जाति व्यवस्था और महिलाओं की स्थिति का सवाल सबसे आगे रहता है। स्वामी रामदेव ने इस मोर्चे पर भी खुलकर अपनी बात रखी। मनुस्मृति का हवाला देते हुए उन्होंने नारी सम्मान से जुड़े श्लोकों को सामने रखा और दो टूक कहा कि सनातन कभी भी किसी जाति के अपमान का समर्थन नहीं करता। उनके अनुसार, वर्ण व्यवस्था कभी जन्म से तय नहीं होती थी, बल्कि यह पूरी तरह कर्म, गुण और स्वभाव पर आधारित थी।

उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित करते हुए कहा, जो अज्ञान को मिटा दे वह ब्राह्मण, जो अन्याय और अत्याचार से लड़े वह क्षत्रिय, जो आर्थिक अभाव को दूर करे वह वैश्य और जो हर तरह की अपवित्रता को मिटाकर समाज में शुचिता स्थापित करे, वह शूद्र है। उनके मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपने उत्तम कर्मों से श्रेष्ठ बन सकता है और ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाला भी अपने कर्मों की भ्रष्टता से अपनी पहचान खो सकता है।

उनका पूरा जोर इस बात पर था कि सनातन को जन्म आधारित ऊंच-नीच और भेदभाव की व्यवस्था के रूप में पेश करना इसके मूल दर्शन के साथ सबसे बड़ा अन्याय है। उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा कि हम सब एक ही ब्रह्मकुल की संतान हैं। अलग-अलग आजीविकाओं और कर्मों के कारण भले ही हमारी सामाजिक पहचान अलग बनी हो, लेकिन उन्हें नफरत और भेदभाव की स्थाई दीवारों में बदल देना कतई स्वीकार्य नहीं है।

यहीं से उनकी बात भारतीय समाज की मूल एकता पर आकर टिकती है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, आदिवासी और वनवासी के बीच कृत्रिम भेद पैदा करके ही इस समाज को तोड़ा गया। इसी सामाजिक फूट ने भारत को ऐतिहासिक रूप से कमजोर किया और विदेशी आक्रांताओं को यहां पैर पसारने का सुनहरा अवसर दिया।

अब केवल विरोध नहीं, ‘शास्त्र शुद्धि’ का महाअभियान

स्वामी रामदेव की इस पूरी वैचारिक यात्रा का सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ तब आया, जब उन्होंने केवल मौखिक विरोध जताने के बजाय सीधे तौर पर ‘शास्त्रों के शुद्धि’ का ठोस एक्शन प्लान देश के सामने रख दिया। उन्होंने इसी प्रेस वार्ता में एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की ओर इशारा कर दिया। जो सनातन के ग्रंथों में हुए प्रक्षेपों और गलत व्याख्याओं को चुन-चुनकर बाहर करेगी।

वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियां और भारतीय दर्शन के तमाम ग्रंथों का जिक्र करते हुए उन्होंने प्रामाणिक साहित्य के प्रकाशन की सख्त जरूरत बताई। उनका कहना था कि गीताप्रेस गोरखपुर से लेकर पतंजलि और देश के अन्य प्रमुख संस्थानों तक से प्रकाशित होने वाले ग्रंथों से मिलावटी अंशों को हटाकर और गलत व्याख्याओं का प्रामाणिक पुनर्मूल्यांकन करके ही उनका असली और पावन स्वरूप पाठकों के सामने लाया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शास्त्रों की व्याख्या करने का अधिकार हर किसी को नहीं मिल जाना चाहिए, इसके लिए व्यक्ति को संस्कृत भाषा और व्याकरण का गाढ़ा ज्ञान होना चाहिए। पंचोपदेश, अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, निघंटु, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे मूल ग्रंथों की थाह पाए बिना शास्त्रों पर कोई अंतिम निष्कर्ष देना मूर्खता है।
यानी, स्वामी रामदेव अब इस संवेदनशील मुद्दे को सिर्फ आस्था, भावना या बहसों की भेंट नहीं चढ़ाना चाहते थे। उनका साफ कहना था कि सनातन के मूल ग्रंथों की कसौटी पर परखकर ही उसके बारे में कोई बात रखी जाए। जो कुछ सदियों के दौरान इसमें बाहर से थोप दिया गया, उसे मूल शास्त्र मान लेना अब बंद होना चाहिए। उनके लिए यह ‘शास्त्र शुद्धि’ महज कुछ किताबों के पन्नों को सुधारने का काम नहीं है, बल्कि यह सनातन की खोई हुई और मूल पहचान को पुनः स्थापित करने का एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक अभियान है।

इसी महान संकल्प की पृष्ठभूमि था ‘प्राच्य विद्या सम्मेलन’

28 अक्टूबर की इस सुविचारित और दो टूक बातचीत के ठीक अगले दिन पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का भव्य शुभारंभ होना था। देश भर के शीर्ष धर्माचार्यों, शंकराचार्यों, विभिन्न गुरु परंपराओं के संतों और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वानों को एक मंच पर आना था। इस आयोजन में करीब चार से पांच हजार संस्कृत मनीषियों और देश के सैकड़ों शीर्ष आध्यात्मिक गुरुओं की प्रत्यक्ष भागीदारी तय थी। स्वामी रामदेव ने इस आयोजन को पूरी तरह गैर-राजनीतिक करार देते हुए इसके मूल उद्देश्य को सनातन के शुद्ध और अलंकृत स्वरूप को देश-दुनिया के सामने रखना बताया। उनकी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को अगर इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह महज किसी कार्यक्रम की सूचना देने वाली औपचारिकता नहीं थी बल्कि यह एक ऐसा शंखनाद था, जो यह बता रहा था कि आने वाले तीन दिनों तक इस देश के वैचारिक गलियारों में मंथन का मुख्य केंद्र क्या रहने वाला है।

निष्कर्ष–

28 अक्टूबर को स्वामी रामदेव इसी विकृत धारणा के खिलाफ एक चट्टान की तरह तनकर खड़े हो गए थे। उनके शब्दों में गहरी नाराजगी और तल्ख तेवर तो थे ही, लेकिन उससे भी कहीं बड़ा और स्पष्ट संदेश था। सनातन के नाम पर अब तक जो कुछ भी लिखा, गढ़ा और पढ़ाया गया है, उसे बिना सोचे-समझे, आंख मूंदकर स्वीकार करने का दौर अब हमेशा के लिए खत्म होना चाहिए। मूल ग्रंथों की चौखट तक लौटकर उनकी प्रामाणिकता और व्याख्या की नए सिरे से पड़ताल करने की यही वह पहली चिंगारी थी, जिसे उन्होंने 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन की पूर्व संध्या पर देश और दुनिया के सामने पूरी बेबाकी से रख दिया।

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