देशभर के विद्वानों ने लिटरेरी थिअरी और फिलासफी ऑफ लिटरेचर विषय पर शोधार्थियों एवं शिक्षकों का मार्गदर्शन किया

-दर्शन शास्त्र और साहित्य को एक दूसरे से जोड़कर देखा जाना चाहिए : सुमित्रा कुकरेती

-कई राज्यों के शिक्षकों और शोधार्थियों ने सेमिनार में शोध पत्र प्रस्तुत किए

-दर्शनशास्त्र को समझने के लिए साहित्य और साहित्य को समझने के लिए दर्शन शास्त्र का ज्ञान होना जरूरी है

दैनिक समाचार, हरिद्वार 
चमन लाल महाविद्यालय लंढ़ौरा, हरिद्वार के अंग्रेजी, वनस्पति और गणित विभाग की ओर से नेशनल सेमिनार आयोजित किया गया। आईसीपीआर (इंडियन काउंसिल ऑफ फिलोसॉफिकल रिसर्च) की ओर से प्रायोजित सेमिनार में देशभर के विद्वानों ने लिटरेरी थिअरी एंड फिलासफी ऑफ लिटरेचर विषय पर शोधार्थियों और शिक्षकों का मार्गदर्शन किया। कई राज्यों के शिक्षकों और शोधार्थियों ने सेमिनार में शोध पत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के प्रारंभ में आयोजन सचिव डॉ. दीपा अग्रवाल ने सेमिनार की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सेमिनार में प्रतिभाग करने वाले सभी विषय विशेषज्ञों का स्वागत किया। चमनलाल महाविद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष रामकुमार शर्मा और सचिव अरुण हरित ने कार्यक्रम की सफलता के लिए शुभआशीष दिए।ऑनलाइन नेशनल सेमिनार को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) दिल्ली की प्रो वाइस चांसलर प्रो. सुमित्रा कुकरेती ने कहा कि दर्शन शास्त्र और साहित्य को एक दूसरे से जोड़कर देखा जाना चाहिए। दर्शनशास्त्र को समझने के लिए साहित्य और साहित्य को समझने के लिए दर्शन शास्त्र का ज्ञान होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृत काव्य को समझने के लिए अलंकार और रस का ज्ञान होना जरूरी है। 

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के पूर्व डीन प्रो. श्रवण कुमार शर्मा ने कहा कि जीवन में साहित्य हर जगह है। मनुष्य को अपने भाव के प्रस्तुतीकरण के लिए भी साहित्य का ज्ञान होना जरूरी है।भावों और साहित्य को समझने के लिए सहृदय होना ज़रूरी है। जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर, राजस्थान के अंग्रेजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. कल्पना पुरोहित ने कहा कि शिक्षकों को आईडियोलॉजी और मैथोलॉजी को अपने शिक्षण में सम्मिलित करना चाहिए। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विद्यालय के दर्शन विभाग की प्रोफेसर इंदु पांडे खंडूरी ने कहा कि कथा-कहानी तब तक पूरे नहीं होते जब तक उनके अंदर नैतिकता का संदेश नहीं होता। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के देहरादून कैम्पस की प्रोफेसर हेमलता के. ने कहा कि आज के दौर में मनोवैज्ञानिक सुख की प्राप्ति साहित्य के माध्यम से की जा सकती है। भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय हरिद्वार की डॉ. आशिमा श्रवण ने भरत मुनि नाट्य शास्त्र और भारतीय संस्कृति पर चर्चा की। दून विश्वविद्यालय की डॉ. रिचा जोशी ने इंडियन और वेस्टर्न थ्योरी पर प्रकाश डाला। चमन लाल महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सुशील उपाध्याय ने दर्शन और साहित्य के मनोरागी और अनुरागी बिंदुओं पर चर्चा की। सेमिनार में दिल्ली यूनिवर्सिटी के देब हलधर, एसडी डिग्री कॉलेज रुड़की की डॉ भारती शर्मा राजकीय डिग्री कॉलेज के डॉ मुकेश गुप्ता, रजनी सिंघल,रीना वर्मा, निधि व्यास, मयंक रायवानी, पूनम शर्मा,  डॉ. ज्योति, अजय सिंह,साक्षी जैन,अनिमेष शर्मा,शहजादी, डॉ.पल्लवी, डॉ मोनिका गुप्ता आदि ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. दीपा अग्रवाल ने किया। कार्यक्रम संयोजक डॉ ऋचा चौहान और डॉ. तरुण गुप्ता ने सभी प्रतिभागियों का आभार जताया। सेमिनार में डॉ. मंजूषा कौशिक, प्रो.आदित्य गौतम, अजित सिंह तोमर, शरद कुमार पांडे, डॉ इंदु गौतम, डॉक्टर अमीषा, अनुराधा शर्मा, अंशु चुग, अर्चना डिमरी, प्रियंका,डॉ मीरा चौरसिया, वंदना गौतम,स्पर्श चौहान, डॉ.किरण शर्मा,डॉश्वेता, प्रियंका नेगी, प्रेरणा पांडे, रीना मिश्रा, राम मोहन पांडे, नितिन सैनी, गौरव सैनी, सलोनी शर्मा, नवनीत, निविंध्या, डॉ सरोज शर्मा, किरण पंत, खुशबू गौतम, कविता शर्मा, मोनिका अग्रवाल, मोहम्मद ताल्हा, गोपाल, ज्योति पाटील, अपर्णा शर्मा, फजल, चित्रा, दीपिका भट्ट, पूनम चौधरी, भुनेश्वरी आदि ने भी प्रतिभाग किया।

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