श्री सुरेश्वरी देवी मंदिर नवरात्रों की पूजा के लिए विशेष स्थान रखता है : आशीष मारवाड़ी

-भगवान विष्णु के कहने पर देवराज इंद्र ने मां भगवती की तपस्या की थी और विजयश्री का वरदान पाया था

-इंद्रदेव का नाम सुरेश्वर भी कहा जाता है इसलिए यह जगह श्री सुरेश्वरी देवी के नाम से विख्यात हो गई

-मंदिर की गणना देश के प्रसिद्ध सिद्धपीठों में की जाती है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण के केदारखंड में भी मिलता है

-मंदिर के दर्शन मात्र से ही माता के भक्तों को हर विघ्न-बाधाओं पर विजय हासिल करने का वरदान मिल जाता है

वासुदेव राजपूत, दैनिक समाचार

श्री सुरेश्वरी देवी मंदिर

हरिद्वार। धर्मनगरी के हरिद्वार शहर के भेल रानीपुर के घने जंगलों में सिद्धपीठ मां सुरेश्वरी देवी सूरकूट पर्वत पर कई सौ सालों से विराजमान हैं। वैसे तो राजाजी टाइगर रिजर्व के बीच स्थित अन्य लगभग सभी मंदिरों में जाने पर रोक है। लेकिन पौराणिक महत्व के इस मां सुरेश्वरी देवी के मंदिर में आज भी लोग सहजता से आते जाते हैं।

हालांकि रात में मंदिर में रुकने की अनुमति चंद लोगों को छोड़ किसी को नहीं है। यहां आने-जाने वालों पर राजाजी टाइगर रिजर्व प्रशासन की कड़ी नजर रहती है। सुरेश्वरी मंदिर हरिद्वार में स्थित एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर देवी दुर्गा और देवी भगवती को समर्पित इकलौता मंदिर बताया जाता है। इस मंदिर को मां की एक सिद्धपीठ के रूप में भी जाना जाता है। भेल रानीपुर के घने जंगलों में सिद्धपीठ मां सुरेश्वरी देवी सूरकूट पर्वत पर कई सौ सालों से विराजमान हैं। इस मंदिर का अपना ही पौराणिक महत्व है। मंदिर की गणना देश के प्रसिद्ध सिद्धपीठों में की जाती है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण के केदारखंड में भी मिलता है।

श्री सुरेश्वरी देवी मंदिर नवरात्रों की पूजा के लिए विशेष स्थान रखता है : आशीष मारवाड़ी

-मंदिर में शारदीय और वासंतीय नवरात्रों में शतचंडी यज्ञ होता है

आशीष मारवाड़ी

श्री सुरेश्वरी देवी मन्दिर प्रबन्धक समिति रजि ज्वालापुर के मंत्री आशीष मारवाड़ी ने जानकारी देते हुए बताया की धर्मनगरी हरिद्वार के विख्यात श्री सुरेश्वरी देवी मंदिर नवरात्रों की पूजा के लिए विशेष स्थान रखता है। राजाजी नेशनल पार्क की सीमा में प्रतिष्ठित इस मंदिर में पूरे वर्ष शक्ति की उपासना होती है। यह वह स्थल है जहां भगवान विष्णु के कहने पर देवराज इंद्र ने मां भगवती की तपस्या की थी और विजयश्री का वरदान पाया था। सर्वस्वीकार्य मान्यता के अनुसार एक बार देवराज इंद्र का भू-लोक के राजा रजी के पुत्रों के साथ युद्ध हुआ। इसमें देवराज पराजित हो गए। व्यथित होकर इंद्र देव गुरू बृहस्पति की शरण में पहुंचे। देव गुरू बृहस्पति ने इंद्र को श्री हरि विष्णु भगवान की शरण में जाने को कहा। इसके बाद श्री हरि विष्णु भगवान ने इंद्र को शक्ति की उपासना करने को कहा।

उन्होंने बताया की देवराज ने इसी स्थान पर शक्ति की उपासना की। इस पर प्रसन्न होकर शक्ति प्रकट हुई और देवराज को विजश्री का वरदान दिया। इंद्रदेव का नाम सुरेश्वर भी कहा जाता है। इसलिए यह जगह श्री सुरेश्वरी देवी के नाम से विख्यात हो गई। मंदिर में माता की प्राचीन मूर्ति भी विराजमान है। वर्ष-1552 में मंदिर का जीर्णोद्वार किया गया। साल भर श्रद्धालु मंदिर के दर्शन करने को पहुंचते हैं। मंदिर में समय-समय पर भंडारे का आयोजन श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। त्योहार-पर्व के अलावा नवरात्रों को यहां श्रद्धालुओं की खासी भीड़ उमड़ती है। मंदिर में शारदीय और वासंतीय नवरात्रों में शतचंडी यज्ञ होता है। भक्तों में मान्यता है कि मंदिर के दर्शन मात्र से ही माता के भक्तों को हर विघ्न-बाधाओं पर विजय हासिल करने का वरदान मिल जाता है।

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