-बीते दिनों देश के कई राज्यों के पर्यावरणविद् सहित कई लोग प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में जुटे, तय की गई रणनीति
-देशभर की 49 संस्थाओं एवं सामूहिकों ने पर्यावरण पर मुख्य न्यायाधीश की ओर से की गई टिप्पणी पर पत्र लिखा
-गुजरात के पिपावाव पोर्ट के विस्तार से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी पर पर्यावरणविद् हैं नाराज
हरिद्वार: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद उभरी ‘काकरोच जनता पार्टी’ का मसला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि देश के पर्यावरणविदों ने पर्यावरण मामले में मुख्य न्यायाधीश की ओर से की गई टिप्पणी पर एतराज जताते हुए पत्र लिखा है। सिविल सोसायटी की ओर पत्र लिखकर मांग की गई है कि पर्यावरण संबंधी मुकदमों में न्यायालय का रुख करने वाले नागरिकों के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणियां वापस ली जाएं। देशभर की 49 संस्थाओं एवं सामूहिकों के साथ-साथ 553 व्यक्तिगत नागरिकों, जिनमें किसान, मज़दूर, पारिस्थितिकीविद्, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, कलाकार, छात्र और विभिन्न पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं ने संयुक्त रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजने का पुरजोर समर्थन किया है।
भारत के विभिन्न राज्यों कर्नाटक, ओडिशा, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान से पर्यावरणविद् और जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग देश की प्राकृतिक पारिस्थितिकीय व्यवस्थाओं की गंभीर स्थिति को सामने रखने के लिए राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे।
उन्होंने एक पत्र भी जारी किया, जिसे देशभर के नागरिकों और सिविल सोसायटी संगठनों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजा है। पत्र में 11 मई 2026 को गुजरात में पिपावाव पोर्ट के विस्तार से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश द्वारा न्यायालय में की गई मौखिक टिप्पणियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। ये टिप्पणियाँ पर्यावरण संरक्षण के लिए नागरिकों के अधिकार तथा अवैध निर्णयों और अनियमितताओं को न्यायालयों में चुनौती देने के उनके अधिकार से जुड़ी थीं।

मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने वालों में यूनाइटेड कंज़र्वेशन मूवमेंट के प्रबंध न्यासी, जोसेफ हूवर कहते हैं कि भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से हम सभी को गहरी पीड़ा पहुंची है। इस तरह की भाषा से यह खतरा पैदा होता है कि जो नागरिक पर्यावरणीय निर्णयों की वैधानिक समीक्षा की मांग करते हैं, उन्हें संवैधानिक लोकतंत्र के सहभागी के बजाय एक संदिग्ध वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जाए, जबकि वे अपने अधिकार और कर्तव्य दोनों का निर्वहन कर रहे होते हैं। हम मांग करते हैं कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय 11 मई 2026 को पिपावाव पोर्ट की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों को वापस लें, ताकि उन्हें वास्तविक पर्यावरणीय जनहित याचिकाओं की वैधता या पर्यावरणीय कानूनों के पालन के लिए प्रभावित समुदायों और नागरिकों की संवैधानिक भूमिका पर संदेह के रूप में न समझा जाए।
लोक शक्ति अभियान के राष्ट्रीय संयोजक एवं ओडिशा के वरिष्ठ पर्यावरणविद् प्रफुल्ल सामंतरा ने कहा कि हम ‘पर्यावरणविद्’ शब्द का अवमाननापूर्ण या उसकी वैधता कम करने वाले रूप में इस्तेमाल किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हैं। ‘पर्यावरणविद्’ शब्द का अर्थ सकारात्मक है। यह उन नागरिकों को दर्शाता है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क)(छ) के तहत अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह प्रावधान प्रत्येक नागरिक पर यह मौलिक कर्तव्य डालता है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन, झीलें, नदियाँ और वन्यजीव शामिल हैं, का संरक्षण और संवर्धन करे।
जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति, उत्तराखंड के अतुल सती
ने कहा कि ‘भारत के प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्र, चाहे वह हिमालय हो, अरावली पर्वतमाला, पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्व भारत या हमारे द्वीप, जैसे अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह-केवल जैव विविधता के भंडार नहीं हैं। वे वह कार्यात्मक आधारभूत संरचना हैं, जिन पर हमारे देश की जल, खाद्य और जलवायु प्रणालियाँ निर्भर करती हैं। इनका विनाश विकास से अलग कोई मात्र संरक्षण संबंधी चिंता नहीं है, बल्कि स्वयं विकास के लिए एक गंभीर खतरा है। यह दावा भी गलत है कि हर चीज़ अदालत में घसीट ली जाती है। पर्यावरण संबंधी जनहित याचिकाएँ सर्वोच्च न्यायालय में आने वाले कुल मामलों का केवल एक छोटा हिस्सा हैं।
पावना अहीर, कोटपूतली-बहरोड़, राजस्थान के निवासी एवं श्रमिक ग्यारसी लाल ने कहा कि भारत के गरीब लोगों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण कोई वैचारिक पसंद नहीं है, यह हमारे अस्तित्व की शर्त है। मेरे गाँव में घरों, बच्चों के स्कूल और कृषि भूमि के पास हो रही खनन और ब्लास्टिंग हमारे जीने के अधिकार को खतरे में डाल रही है। हमने कई बार स्थानीय प्रशासन और सरकारी अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन हमारे जैसे गरीब लोगों की कोई सुनवाई नहीं होती। हम तो बस इतना चाहते हैं कि हमारी ज़िंदगी धमाकों में तबाह हुए बिना शांति से गुजर सके। क्या यह मांग करना भी बहुत ज़्यादा है? ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हम नागरिकों के लिए न्यायपालिका ही अंतिम आशा और सहारा है।
स्टैंड विद नेचर, हरियाणा के संस्थापक, लोकेश भवानी ने कहा कि ‘संसद द्वारा वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम पारित किया जाना स्वयं इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि औद्योगिक परियोजनाएँ वास्तविक और व्यापक पर्यावरणीय नुकसान पहुँचा सकती हैं, और इसके लिए एक समर्पित तथा विशेष न्यायिक मंच की आवश्यकता है। किसी भी गतिविधि को सतत विकास कहे जाने के लिए पर्यावरणीय कानूनों का पूर्ण पालन आवश्यक है।
उत्तर राजस्थान क्षेत्र के सेवानिवृत्त शिक्षक प्रभु दयाल वर्मा ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों के हमारे संघर्ष को नवंबर 2025 की शुरुआत में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सकारात्मक आदेश से कुछ राहत और उम्मीद मिली थी। जोधपुरा संघर्ष समिति बनाम भारत संघ एवं अन्य’ मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने उत्तर राजस्थान के अरावली पर्वतमाला क्षेत्र के जोधपुरा गाँव के लोगों के जीवन के अधिकार को बरकरार रखा, जो अल्ट्राटेक सीमेंट कंपनी की खनन और स्टोन क्रशिंग गतिविधियों से गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया था कि वे चूना पत्थर खनन क्षेत्र के निकट रहने वाले प्रदूषण-पीड़ित लोगों के पुनर्वास के लिए आवश्यक कदम उठाएँ।
दिल्ली की एक पर्यावरणविद् तनुजा चौहान ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता के मामले में भारत विश्व का नौवाँ सबसे अधिक प्रभावित देश है। इसलिए हमारे बचे हुए कार्बन सिंक और पारिस्थितिकीय जीवन-रेखाओं की रक्षा करना कोई वैचारिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। भारत के करोड़ों लोग, जिनकी आजीविका जंगलों, जलवायु-संवेदनशील कृषि, स्वच्छ जल और तटीय मत्स्य संसाधनों पर निर्भर है, उनके लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण और भारत का सर्वोच्च न्यायालय अंतिम सहारा और उम्मीद की किरण हैं।

अदालत ने क्या की थी टिप्पणी
अदालत ने यह टिप्पणी की थी कि इस देश में जिस प्रकार की याचिकाएँ दायर की जाती हैं, उनका उद्देश्य केवल सभी विकास परियोजनाओं को रोकना होता है। आप हमें इस देश की एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जहाँ ये तथाकथित पर्यावरणविद् और कार्यकर्ता यह कहते हों कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं। आपके पास कितनी सारी डिग्रियां हैं। मैं सूचना का अधिकार कार्यकर्ता हूँ, मैं पर्यावरणविद् हूँ, मैं सामाजिक कार्यकर्ता हूँ, मैं अमुक-अमुक कार्यकर्ता हूँ।








