‘आ जा बाबू… आ बेटू…’
जब एक नन्हीं-सी बछिया ने सिखाया कि प्रेम की भाषा शब्दों की नहीं, भावनाओं की होती है
“आ जा बाबू… आ जा… आ बेटू… देख मैं जा रहा हूं… तेरी मां बुला रही है…”
इन शब्दों में न कोई आदेश है, न औपचारिकता। इनमें केवल अपनापन है। ऐसा अपनापन, जिसे सुनते ही एक नन्हीं-सी बछिया अपने छोटे-छोटे कदमों से दौड़ पड़ती है।
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि हरिद्वार के कनखल स्थित दिव्य योग मंदिर, दादूबाग का एक जीवंत दृश्य है। ऐसा दृश्य, जिसे देखकर सहज ही विश्वास हो जाता है कि प्रेम केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं होता। वह हर उस हृदय तक पहुंचता है, जहां संवेदना जीवित होती है।
उस नन्हीं-सी बछिया का नाम है—वृंदा।
जब वृंदा को पता चल जाता है कि ‘आचार्य जी कहीं जा रहे हैं’
वृंदा अभी बहुत छोटी है। चंचल भी है और बेहद मासूम भी।
लेकिन उसकी मासूमियत के पीछे एक अद्भुत समझ भी छिपी हुई है। जैसे ही उसे आभास होता है कि आचार्य बालकृष्ण कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं, वह तुरंत उनके आसपास आकर खड़ी हो जाती है।
कभी वह उनके आगे-आगे दौड़ती है, कभी उनके रास्ते में आ जाती है और कभी बिना कुछ कहे बस उन्हें एकटक निहारती रहती है।
मानो उसकी मासूम आंखें कह रही हों—
“थोड़ी देर और रुक जाइए…”
व्यस्तता के बीच भी नहीं भूलते अपना यह परिवार
देश-विदेश में फैले संस्थानों की जिम्मेदारियां, आयुर्वेद अनुसंधान, कृषि, शिक्षा, योग और अनेक सामाजिक व राष्ट्रीय परियोजनाओं का संचालन…
आचार्य बालकृष्ण का अधिकांश समय इन्हीं दायित्वों के बीच बीतता है।
लेकिन जो बात उन्हें सबसे अलग बनाती है, वह यह है कि इतनी व्यस्तताओं के बावजूद उनके पास वृंदा जैसी एक नन्हीं बछिया के लिए भी समय है।
वे केवल उसे सहलाते ही नहीं, बल्कि उससे बातें भी करते हैं। उसे प्यार से पुकारते हैं। उसके साथ कुछ कदम चलते हैं। और जब उसकी मां उसे आवाज देती है, तो स्वयं उसे उसकी मां के पास छोड़ने भी जाते हैं।
यही वह संवेदनशीलता है, जो शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से दिखाई देती है।
‘आ जा बाबू… आ बेटू…’ — इस पुकार में छिपा है वात्सल्य

आचार्य बालकृष्ण के आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर साझा किए गए वीडियो में जब वे प्यार से कहते हैं—
“आ जा बाबू… आ बेटू… देख मैं जा रहा हूं… चल… तेरी मां बुला रही है…”
तो यह दृश्य केवल एक वीडियो नहीं रह जाता।
ऐसा लगता है जैसे कोई पिता अपने छोटे बच्चे को प्यार से समझा रहा हो।
उनकी आवाज में स्नेह है।
शब्दों में ममता है।
और चेहरे पर वह मुस्कान है, जिसे अभिनय से नहीं, बल्कि सच्चे आत्मीय भावों से ही पाया जा सकता है।
मां की पुकार… और दो रिश्तों के बीच खड़ी वृंदा
उधर वृंदा की मां भी उसे लगातार पुकार रही है।
इधर आचार्य बालकृष्ण उसे प्यार से समझाते हुए कहते हैं—
“देख वृंदा… तेरी मां बुला रही है…”
वृंदा कुछ पल आचार्य जी को देखती है।
फिर अपनी मां की ओर।
उस क्षण ऐसा महसूस होता है मानो वह दोनों के स्नेह को एक साथ जी रही हो।
यह दृश्य केवल आंखों से नहीं, दिल से महसूस किया जा सकता है।
यह दृश्य इसलिए हमेशा याद रह जाता है…

आज के समय में, जब इंसान के पास इंसान के लिए भी समय कम पड़ जाता है, ऐसे दौर में यदि कोई व्यक्ति अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से कुछ पल निकालकर एक नन्हीं बछिया के साथ इतना आत्मीय रिश्ता निभाता है, तो वह केवल एक दृश्य नहीं रह जाता।
वह एक संदेश बन जाता है।
करुणा का संदेश।
सह-अस्तित्व का संदेश।
और उस भारतीय जीवन-दर्शन का संदेश, जहां गौवंश केवल पशु नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
आखिर में…
वृंदा शायद शब्दों का अर्थ नहीं जानती।
लेकिन वह आवाज पहचानती है।
वह स्नेह पहचानती है।
वह अपनापन पहचानती है।
और शायद यही कारण है कि आचार्य बालकृष्ण की केवल एक पुकार—
“आ जा बाबू… आ बेटू…”
उसके छोटे-छोटे कदमों को दौड़ पड़ने के लिए काफी होती है।
क्योंकि सच तो यही है—
प्रेम की भाषा शब्दों की नहीं, भावनाओं की होती है।








