उत्तराखंड में सड़क चौड़ीकरण की एक महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की बहस तेज हो गई है। राज्य के पारंपरिक हरेला पर्व, जिसे हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माना जाता है, के दौरान इस बार हजारों पेड़ों की कटाई के विरोध में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ‘ब्लैक हरेला’ मनाया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सड़क विस्तार के लिए 3,000 से अधिक पेड़ों की कटाई की जा रही है, जिससे क्षेत्र के पर्यावरण, वन्यजीवों और स्थानीय जलवायु पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं सरकार का दावा है कि परियोजना के डिजाइन में कई बदलाव कर पर्यावरणीय नुकसान को न्यूनतम रखने का प्रयास किया गया है।
हरेला पर्व के बीच शुरू हुआ विरोध
उत्तराखंड में हर साल मनाया जाने वाला हरेला पर्व प्रकृति, हरियाली और वृक्षारोपण का संदेश देता है। आमतौर पर इस अवसर पर राज्यभर में पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन इस वर्ष कई पर्यावरण संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने इसे ‘ब्लैक हरेला’ के रूप में मनाया।
प्रदर्शनकारियों ने काले कपड़े पहनकर सड़क परियोजना के विरोध में प्रदर्शन किया और पेड़ों की कटाई रोकने की मांग की। उनका कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन इसके लिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है।
सड़क परियोजना में क्यों काटे जा रहे हैं पेड़?
यह परियोजना देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच बेहतर सड़क संपर्क विकसित करने के उद्देश्य से बनाई जा रही है। लगभग 20 किलोमीटर लंबी इस परियोजना की अनुमानित लागत 743 करोड़ रुपये बताई गई है।
परियोजना हाइब्रिड एन्युटी मोड (HAM) के तहत विकसित की जा रही है। सरकार का कहना है कि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, चारधाम यात्रा के दौरान यातायात आसान होगा और भविष्य की परिवहन आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलेगी।
पर्यावरणविदों की क्या है चिंता?
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस क्षेत्र में पेड़ों की कटाई हो रही है, वह पहले से ही पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बड़ी संख्या में पेड़ों के हटने से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जिनमें शामिल हैं—
- हरित क्षेत्र में कमी
- स्थानीय वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर असर
- तापमान और सूक्ष्म जलवायु (माइक्रोक्लाइमेट) में बदलाव
- मिट्टी के कटाव और वर्षा जल संरक्षण पर प्रभाव
- जैव विविधता में गिरावट
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि समय रहते वैकल्पिक समाधान नहीं खोजे गए, तो आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
सरकार ने क्या कहा?
परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सड़क निर्माण के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए कई तकनीकी बदलाव किए गए हैं।
अधिकारियों के अनुसार, सामान्य राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए राइट ऑफ वे (ROW) लगभग 60 मीटर रखा जाता है, लेकिन इस परियोजना में वन क्षेत्र के भीतर इसे घटाकर 23 मीटर कर दिया गया है। उनका दावा है कि इससे अपेक्षाकृत कम पेड़ों की कटाई होगी और सड़क सुरक्षा मानकों से भी समझौता नहीं किया जाएगा।
सरकार का यह भी कहना है कि बेहतर सड़क नेटवर्क से स्थानीय लोगों, पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को सुविधा मिलेगी तथा क्षेत्र के आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। एक ओर बेहतर सड़कें, पर्यटन और रोजगार की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की परियोजनाओं में आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों, व्यापक पर्यावरणीय अध्ययन और बड़े स्तर पर पुनर्वनीकरण (Reforestation) जैसे उपाय अपनाकर विकास और प्रकृति के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।








