दिवाली और धनतेरस के साथ देश में शुरू हो रहा पारंपरिक गोल्ड खरीदारी का दौर, आयात और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ता है इसका असर
नई दिल्ली: भारत में त्योहारों का मौसम शुरू होते ही सोने की खरीदारी आमतौर पर बढ़ जाती है। धनतेरस, दिवाली और शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर सोना खरीदना देश के कई परिवारों में शुभ माना जाता है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों से जरूरत न होने पर सोना खरीदने से बचने की अपील पर सबकी नजर रहेगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार मई में लोगों से गैर-जरूरी सोने की खरीदारी को करीब एक साल तक टालने की अपील की थी। इसके पीछे विदेशी मुद्रा बचाने और देश के आयात खर्च को नियंत्रित रखने की चिंता बताई गई थी। सितंबर में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर लोगों से आग्रह किया कि सोना केवल जरूरत होने पर ही खरीदा जाए।
अब आने वाले त्योहारी दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परंपरागत खरीदारी और इस अपील के बीच बाजार में किस तरह का बदलाव दिखाई देता है।
भारत के लिए सोने का आयात क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत अपनी घरेलू जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात किए गए सोने से पूरा करता है। वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में देश की कुल सोने की आपूर्ति में आयात की हिस्सेदारी करीब 82 प्रतिशत रही। शेष मांग का बड़ा हिस्सा पुराने सोने के पुनर्चक्रण से पूरा हुआ।
जब देश में सोने की भौतिक मांग तेजी से बढ़ती है तो आयात की जरूरत भी बढ़ सकती है। इससे डॉलर में भुगतान बढ़ता है और विदेशी मुद्रा पर दबाव आ सकता है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, 2025 में सोना भारत के शीर्ष पांच आयातित उत्पादों में शामिल था और कुल वस्तु आयात में इसकी हिस्सेदारी लगभग 8 प्रतिशत रही।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 11 सितंबर 2026 को देश का विदेशी मुद्रा भंडार 780.78 अरब डॉलर था। इससे एक सप्ताह पहले यह 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था।
ऐसे में सोने के आयात से होने वाला डॉलर खर्च नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
त्योहारों में बदल सकता है खरीदारी का रुझान
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने जून में कहा था कि प्रधानमंत्री की अपील का असर खासकर शहरी क्षेत्रों में गैर-जरूरी सोने की खरीद पर दिखाई दिया। हालांकि, भारत में सोने की खरीद केवल कीमतों और निवेश से जुड़ी नहीं है। त्योहार और पारिवारिक परंपराएं भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं।
धनतेरस और अक्षय तृतीया ऐसे प्रमुख अवसर हैं, जब बड़ी संख्या में लोग सोना खरीदना शुभ मानते हैं। यही कारण है कि त्योहारी सीजन में बाजार की मांग पर विशेष नजर रहती है।
हाल के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि ऊंची कीमतों और अन्य परिस्थितियों के बावजूद उपभोक्ता पूरी तरह सोने से दूरी नहीं बना रहे हैं, बल्कि खरीदारी का तरीका बदल रहे हैं।
गणेश चतुर्थी में करीब 15 फीसदी घटी बिक्री
इस साल गणेश चतुर्थी के दौरान सोने की बिक्री की मात्रा में लगभग 15 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। हालांकि, बाजार में मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। ग्राहकों ने भारी आभूषणों की जगह हल्के डिजाइन को प्राथमिकता दी और पुराने सोने को बदलकर नए आभूषण लेने का विकल्प भी अपनाया।
इसके अलावा सोने के सिक्कों और बार की मांग भी बनी रही। यही रुझान धनतेरस और दिवाली के दौरान भी दिखाई देता है या नहीं, यह बाजार के लिए अहम संकेत होगा।
‘त्योहारों पर सोना खरीदना सिर्फ कीमत का मामला नहीं’
ग्रोथवाइन कैपिटल के सह-संस्थापक और सीईओ शुभम गुप्ता, CFA के मुताबिक, त्योहारों पर सोना खरीदने के पीछे आर्थिक और भावनात्मक दोनों कारण होते हैं।
उन्होंने कहा कि परिवार सोने की कीमत, देश के आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रख सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ त्योहारों पर सोना खरीदना परंपरा और शुभता से भी जुड़ा हुआ है।
गुप्ता के अनुसार, किसी व्यक्ति के लिए यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है कि उसके पास पहले से कितना सोना मौजूद है। यदि किसी परिवार के पास पहले से ही सोने में पर्याप्त निवेश है, तो त्योहार के अवसर पर बड़ी मात्रा में अतिरिक्त खरीदारी करना जरूरी नहीं है।
ऐसे परिवार प्रतीकात्मक तौर पर थोड़ी खरीदारी कर सकते हैं या अतिरिक्त खरीदारी नहीं करने का विकल्प भी अपना सकते हैं।
निवेश के लिए फिजिकल गोल्ड ही एकमात्र विकल्प नहीं
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति का उद्देश्य केवल सोने में निवेश से रिटर्न हासिल करना है, तो आभूषण खरीदना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। निवेशक गोल्ड ETF या गोल्ड म्यूचुअल फंड जैसे विकल्पों के जरिए भी सोने की कीमतों में होने वाले बदलाव से जुड़ सकते हैं।
इस तरह आने वाला त्योहारी सीजन दो अलग-अलग रुझानों के बीच संतुलन दिखा सकता है—एक तरफ सोने की खरीदारी से जुड़ी भारतीय परंपराएं और दूसरी तरफ आयात खर्च तथा विदेशी मुद्रा बचाने की आर्थिक चिंता। धनतेरस और दिवाली के दौरान ग्राहकों का व्यवहार इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।








