मालाग्राम से दुनिया तक गूंजेगी ज्ञान की यह विरासत, हिमालय में आकार ले रहा वैश्विक धन्वंतरि धाम
हिमालय में रची जा रही इतिहास की नई इबारत, पांच साल के पुरुषार्थ से वैश्विक ज्ञान का केंद्र बन रहा धन्वंतरि धाम
कुछ जगहें केवल जमीन पर नहीं बनतीं, वे किसी के विचारों, संकल्प और वर्षों के अथक पुरुषार्थ से आकार लेती हैं। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का मालाग्राम आज ऐसी ही एक कहानी कह रहा है।
पांच साल पहले हिमालय की गोद में बसे इस दुर्गम वन क्षेत्र में आज जो संसार दिखाई दे रहा है, उसकी कल्पना करना भी आसान नहीं था। चारों ओर पहाड़, घने जंगल और प्रकृति की अपनी चुनौतियां। लेकिन दूरदर्शी सोच के धनी आचार्य बालकृष्ण ने इसी निर्जन से दिखने वाले भूभाग में एक ऐसी दुनिया बसाने का सपना देखा, जहां आयुर्वेद केवल किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रकृति, विज्ञान, अनुसंधान, संस्कृति और मानव कल्याण का जीवंत केंद्र बने।
आज उसी कल्पना का नाम है- हर्बल वर्ल्ड हिमालय-श्री धन्वंतरि धाम।
इस बदलाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे देखने वाले उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत भी स्वीकार करते हैं कि पांच वर्ष पहले यहां इतना बड़ा प्रकल्प आकार लेगा, इसकी कल्पना करना कठिन था। उन्होंने स्वयं माना कि आचार्य बालकृष्ण ने जिस समर्पण और परिश्रम से इस दुर्गम क्षेत्र में काम किया है, वह असाधारण है। उनका विश्वास है कि आने वाले पांच वर्षों में दुनिया भर के लोग यहां देखने और सीखने आएंगे।
किसी परियोजना के बारे में उसके निर्माता का सपना सुनना अलग बात है, लेकिन उस क्षेत्र के विकास को करीब से देखने वाले एक मंत्री का यह स्वीकार करना कि पांच साल में तस्वीर इतनी बदल जाएगी, उनके लिए भी कल्पना से परे था, अपने आप में बहुत कुछ कहता है। धन्वंतरि धाम की सबसे अनूठी बात इसकी भव्यता नहीं, इसके पीछे छिपा विचार है।

यहां दुनिया के उन ऋषियों, वनस्पति विशेषज्ञों और चिकित्सा मनीषियों को प्रतिमाओं के माध्यम से सम्मान दिया जा रहा है, जिन्होंने औषधीय वनस्पतियों और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को समृद्ध करने में अपना जीवन लगाया। इनमें ऐसे व्यक्तित्व भी शामिल हैं, जिन्हें उनके अपने देशों में वह पहचान और सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वे हकदार थे।
जरा इस विचार की व्यापकता देखिए! दुनिया के अलग-अलग देशों में जन्मे, अलग-अलग संस्कृतियों में पले-बढ़े ज्ञान साधकों को हिमालय की धरती पर एक साथ सम्मान देना। यह किसी सीमा, भाषा या देश की परिधि में बंधा हुआ विचार नहीं है। यह ज्ञान के प्रति कृतज्ञता का भाव है। यह संदेश है कि मानवता के कल्याण के लिए जिसने भी ज्ञान अर्जित किया, उसका सम्मान पूरी दुनिया का दायित्व है।
शायद यही वह दृष्टि है, जो धन्वंतरि धाम को सामान्य हर्बल गार्डन से अलग पहचान देती है।
करीब 200 एकड़ में विकसित हो रहा यह परिसर 50 हजार से अधिक औषधीय पौधों से समृद्ध हो रहा है। यहां हिमालय की जैव विविधता, प्राकृतिक जलस्रोतों और वनस्पतियों को सहेजने के साथ उनके वैज्ञानिक अध्ययन की संभावनाएं विकसित की जा रही हैं। 29 देशों की जड़ी-बूटियों और उनकी ज्ञान परंपराओं को एक साथ समझने का प्रयास भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है।
आचार्य बालकृष्ण के लिए यह कोई व्यावसायिक परियोजना नहीं, बल्कि दुनिया को भारतीय ज्ञान, प्रकृति और संस्कृति से आत्मीयता के साथ जोड़ने का संकल्प है।
इस पूरी परिकल्पना का एक दूसरा पक्ष भी है, जो उत्तराखंड के भविष्य से जुड़ता है। पहाड़ों से पलायन रोकना केवल भावनात्मक अपीलों से संभव नहीं होगा। इसके लिए पहाड़ में ही रोजगार, आजीविका और सम्मानजनक जीवन के अवसर पैदा करने होंगे। औषधीय पौधों की खेती, प्राकृतिक कृषि और उच्च मूल्य वाली फसलें इस दिशा में नई संभावनाएं खोल सकती हैं। धन्वंतरि धाम में किसानों को इन्हीं गतिविधियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की सोच है।
और फिर हिमालय का वह आध्यात्मिक पक्ष, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। जिस धरती को सदियों से ऋषियों और मुनियों की तपस्थली माना गया, उसी प्रकृति के सान्निध्य में ध्यान और साधना का केंद्र विकसित किया जा रहा है। यहां आने वाला व्यक्ति केवल वनस्पतियों का संसार नहीं देखेगा, बल्कि प्रकृति के बीच कुछ पल ठहरने, स्वयं से जुड़ने और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को अनुभव करने का अवसर भी पाएगा।

मालाग्राम की यह कहानी दरअसल एक बड़े विचार के साकार होने की कहानी है। पांच साल पहले जो कल्पना दुर्गम पहाड़ों के बीच एक कठिन सपना लगती थी, आज वह हजारों पौधों, विकसित होते परिसर और दुनिया के ज्ञान मनीषियों को सम्मान देने वाली परिकल्पना के रूप में सामने है।
आचार्य बालकृष्ण का लक्ष्य इसे आने वाले पांच वर्षों में वैश्विक पहचान दिलाना है। हर्बल कुंभ को हर वर्ष आयोजित करने की घोषणा भी इसी निरंतरता का संकेत है।
सवाल यह नहीं कि मालाग्राम में कितना बड़ा परिसर बन रहा है। असली बात यह है कि यहां किस तरह की दुनिया रची जा रही है। एक ऐसी दुनिया, जहां प्रकृति संपदा है, ज्ञान विरासत है, अनुसंधान भविष्य है और मानवता सबसे बड़ा उद्देश्य। शायद इसी सोच के कारण हिमालय की गोद में आकार ले रहा धन्वंतरि धाम आने वाले समय में दुनिया के लिए अध्ययन, अनुसंधान और प्रेरणा का एक नया प्रतिमान बन सकेगा।







