एक ओर नवरात्रि अनुष्ठान, दूसरी ओर पहाड़ की पथरीली राहें… आचार्य बालकृष्ण की अनूठी साधना
‘तेरा गांव तुझको पुकारे’… पहाड़ के दर्द को करीब से महसूस करते हुए नई राह तलाश रहे आचार्य बालकृष्ण
पथरीला रास्ता, कहीं नुकीले पत्थर तो कहीं घनी और कंटीली झाड़ियां। पहाड़ से आया मलबा रास्ता रोके खड़ा है। नीचे उतरने के लिए ढलान इतनी कठिन कि जरा-सी चूक जोखिम भरी साबित हो सकती है। ऐसे दुर्गम रास्ते पर आमतौर पर हर कदम बेहद संभलकर रखना पड़ता है। लेकिन यहां आचार्य बालकृष्ण न केवल आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि अपने सहयोगियों के साथ रास्ता साफ करने और आगे की राह तलाशने में भी जुटे हैं।
पैरों में चप्पल तक नहीं। चेहरे पर थकान के बजाय उत्साह है। बीच-बीच में हंसी-मजाक भी चल रहा है, ताकि दुर्गम रास्ता मंजिल तक पहुंचने में बाधा न बने। यह किसी पर्यटन यात्रा या एडवेंचर का दृश्य नहीं है। न ही किसी बड़े सरकारी प्रोजेक्ट या कॉरपोरेट निर्माण की तैयारी। यह उत्तराखंड के पहाड़ों में उन संभावनाओं को तलाशने की कोशिश है, जो पलायन की मार झेल रहे गांवों को फिर से आबाद करने का आधार बन सकती हैं।
पतंजलि योगपीठ के महामंत्री और आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण इन दिनों पौड़ी गढ़वाल जिले के यमकेश्वर ब्लॉक के मालागांव स्थित श्री धन्वंतरि धाम हर्बल वर्ल्ड में नौ दिवसीय नवरात्रि अनुष्ठान के लिए पहुंचे हैं। अनुष्ठान में उपासना है, साधना है और परमात्मा की स्तुति का निर्धारित क्रम भी। लेकिन जिस व्यक्ति का मन जड़ी-बूटियों, पेड़-पौधों, जंगलों और प्रकृति की विविधता में रमता हो, वह पहाड़ की ऐसी वादियों में पहुंचकर केवल एक स्थान तक कैसे सीमित रह सकता है?
इसीलिए साधना के बीच समय निकालकर आचार्य बालकृष्ण अपने सहयोगियों के साथ उस दुर्गम भूभाग की ओर निकल पड़े, जहां रास्ता बनाना भी चुनौती है और खेती की कल्पना करना भी संघर्ष से कम नहीं। उनकी सोच है कि पहाड़ों की बंजर होती जमीन पर फिर से हरियाली लौटे, जंगलों में पाई जाने वाली औषधीय वनस्पतियां आजीविका का आधार बनें और किसानों को नई फसलों के प्रयोग के लिए व्यावहारिक उदाहरण मिल सकें।
रास्ता बनेगा, तभी संभावनाओं तक पहुंचेंगे
दुर्गम रास्ते पर आगे बढ़ते हुए आचार्य बालकृष्ण कहते हैं, “जब तक पथरीले मार्ग पर हम स्वयं नहीं चलेंगे, तब तक वहां सुगम रास्ता बनाने की संभावनाओं को नहीं ढूंढ सकते।”
उनके लिए यह बात केवल रास्ता बनाने तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का हिस्सा है, जिसमें किसी समस्या का समाधान दूर बैठकर नहीं, बल्कि उसके बीच पहुंचकर तलाशने पर जोर दिया जाता है।
वे बताते हैं कि यहां प्रयास दुर्गम भूभाग में छिपी संभावनाओं को तलाशने जैसा है। कुछ लोग इसे एडवेंचर कह सकते हैं, लेकिन इसका उद्देश्य केवल रोमांच नहीं है। असली मकसद उस जमीन तक पहुंचना है, जहां जड़ी-बूटियां लगाई जा सकें, खेती-बाड़ी हो सके और प्रकृति के साथ तालमेल बनाते हुए रोजगार के नए रास्ते खुल सकें।
आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, रास्ता बन जाने के बाद वह जगह आसान दिखाई देने लगती है, लेकिन उसके निर्माण से पहले आने वाली कठिनाइयों को समझना भी जरूरी है। इसी सोच के साथ यहां ‘बिफोर एंड आफ्टर’ यानी काम से पहले और काम के बाद की स्थिति को दर्ज करने की शुरुआत की गई है।
वे कहते हैं, “जड़ी-बूटियां उगती हैं तो सभी को अच्छा लगता है। लेकिन उन्हें उगाने और उस जगह तक पहुंचने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है, यह भी देखना चाहिए।”
यही इस पूरी कवायद का मूल भाव है। तैयार खेत की हरियाली दिखाना आसान है, लेकिन उस जमीन तक पहुंचने, मलबा हटाने, झाड़ियां साफ करने और खेती योग्य स्थिति बनाने में लगने वाले श्रम को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है।
आचार्य बालकृष्ण अपने सहयोगियों के साथ ढलान पर उतरते हैं। कहीं पत्थर हटाए जा रहे हैं तो कहीं झाड़ियों के बीच से रास्ता बनाया जा रहा है। वह खुद भी इस काम में हाथ बंटाते हैं। खतरनाक ढलान पर उतरने और रास्ता तलाशने के दौरान वे सहज अंदाज में अपने चप्पलों की स्थिति पर भी टिप्पणी करते हैं।
उनकी बातों में सहजता है। वे इसे केवल कठिन काम नहीं, बल्कि आनंद का अनुभव भी बताते हैं। हालांकि, साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि इस आनंद के पीछे समझ, विवेक और सही निर्णय की जरूरत होती है। पहाड़ में काम करना केवल उत्साह का विषय नहीं है। यहां प्रकृति, भूभाग और जोखिम को समझना भी जरूरी है।
उनके शब्दों में, “बाबा लोग मस्ती करते हैं। मस्ती तो है, आनंद तो है, पर यह आनंद लेने के लिए बुद्धि और निर्णय भी चाहिए।”
यह श्रम किसी वीडियो के लिए दृश्य तैयार करने की कवायद नहीं है। आचार्य बताते हैं कि रास्ता बनाने की प्रक्रिया को दर्ज करने का उद्देश्य इसे प्रमाण के रूप में रखना है, ताकि लोग देख सकें कि आज जो रास्ता सरल दिखाई देता है, वहां तक पहुंचने के लिए पहले कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी।
पहाड़ की पीड़ा केवल पलायन के आंकड़ों में नहीं समाती

उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन की चर्चा अक्सर आंकड़ों, सरकारी योजनाओं और रोजगार के अवसरों तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसी गांव की खाली होती बस्तियों, उजड़ते खेतों और झाड़ियों से ढकती जमीन को करीब से देखने पर इस पीड़ा का एक अलग ही रूप सामने आता है। मालागांव में आचार्य बालकृष्ण इसी बदलाव को महसूस कर रहे हैं।
वे पहाड़ों से लोगों के पलायन की बात करते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं। उन्हें लगता है कि जिस जमीन ने पीढ़ियों तक लोगों को जीवन दिया, वह आज धीरे-धीरे खेती और आबादी से दूर होती जा रही है। खेत छूट गए हैं, जमीन पर मलबा जमा है और कई जगह झाड़ियों ने पूरे भूभाग को घेर लिया है।
इसी भाव को व्यक्त करते हुए उनके मन में गीत की पंक्ति उभरती है, ‘घर आ जा परदेसी, तेरा यह गांव तुझको पुकारे।’
यह केवल एक भावुक पंक्ति नहीं, बल्कि पहाड़ के उन गांवों की तस्वीर है, जहां कभी खेती-बाड़ी और स्थानीय जीवन की चहल-पहल हुआ करती थी। आज उन्हीं स्थानों पर दोबारा खेती शुरू करने के लिए पहले जमीन तक पहुंचने का रास्ता बनाना पड़ रहा है।
आचार्य बालकृष्ण का मानना है कि पहाड़ के लोगों को रोजगार और आजीविका के साधन उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस प्रयास होने चाहिए। केवल पलायन पर चिंता जताने से स्थिति नहीं बदलेगी। गांवों में ऐसी संभावनाएं तैयार करनी होंगी, जिनसे लोगों को अपनी जमीन पर काम करने और कमाई करने का भरोसा मिल सके।
इसी सोच के साथ मालागांव में मॉडल फार्मिंग का प्रयोग किया जा रहा है। आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, यह उत्तराखंड में पलायन रोकने की दिशा में योगदान देने का एक प्रयास है, न कि किसी बड़े सरकारी या कॉरपोरेट प्रोजेक्ट का हिस्सा।
इस पहल का उद्देश्य पहाड़ की परिस्थितियों के अनुकूल पेड़-पौधों, फलों और औषधीय वनस्पतियों की खेती की संभावनाओं को सामने लाना है।
लैंटाना की झाड़ियों के बीच खेती की जमीन तलाशना
मालागांव के इस भूभाग की एक बड़ी चुनौती लैंटाना की घनी झाड़ियाँ हैं। यह आक्रामक विदेशी वनस्पति कई क्षेत्रों में तेजी से फैलकर स्थानीय वनस्पतियों और जमीन के उपयोग को प्रभावित करती है। उत्तराखंड के अनेक पहाड़ी इलाकों में इसका फैलाव चिंता का विषय रहा है।
जहां कभी खेती की संभावना रही होगी, वहां आज झाड़ियों और मलबे के बीच से रास्ता निकालना पड़ रहा है। आचार्य बालकृष्ण बताते हैं कि पहले कुछ हिस्सों को साफ किया गया है और आगे दूसरे दुर्गम क्षेत्रों को भी व्यवस्थित करने का प्रयास किया जाएगा।
झाड़ियों को हटाकर जमीन को इस योग्य बनाना है कि वहां औषधीय पौधे लगाए जा सकें और खेती-बाड़ी की जा सके। यह काम आसान नहीं है। बरसात में कई बार सफाई करनी पड़ती है, क्योंकि झाड़ियां दोबारा उग आती हैं। कहीं नुकीले पत्थर हैं, कहीं कांटे और कीट-पतंगों का सामना करना पड़ता है। ढलान वाले भूभाग में मिट्टी और मलबे की चुनौती अलग है।
लेकिन यहां लक्ष्य केवल झाड़ियों को हटाना नहीं है। असली उद्देश्य उस भूभाग का उपयोग इस तरह करना है कि प्रकृति की मौजूदा संपदा को नुकसान पहुंचाए बिना खेती और औषधीय पौधों की संभावनाएं विकसित की जा सकें।
आचार्य बालकृष्ण इस काम के दौरान पेड़ों को लेकर भी सावधानी बरतने की बात करते हैं। उनके अनुसार, जहां पुराने और विशाल वृक्ष मौजूद हैं, उन्हें बचाना जरूरी है। पेड़ों को बड़ा होने में कई वर्ष लगते हैं और उनकी अपनी उपयोगिता है। इसलिए जमीन को खेती योग्य बनाने का अर्थ हर पेड़ को काट देना नहीं हो सकता।
यहां कोशिश है कि झाड़ियों और मलबे से बाधित हिस्सों को व्यवस्थित किया जाए, उपयोगी वृक्षों को संरक्षित रखा जाए और भूभाग की प्राकृतिक विशेषताओं के अनुसार आगे की योजना बनाई जाए।
जंगल के बीच खेती, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं

मालागांव में मॉडल फार्मिंग की खासियत केवल पौधों की विविधता नहीं, बल्कि उनका चयन भी है। यहां इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि जिस ऊंचाई, जलवायु और भूभाग में जो प्रजातियां अनुकूल हो सकती हैं, उनके प्रयोग किए जाएं।
आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, पौधों का चयन करते समय यह समझना जरूरी है कि किसी क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से कौन-से वृक्ष और वनस्पतियां बेहतर ढंग से विकसित हो सकती हैं। पहाड़ की परिस्थितियां मैदानी इलाकों से अलग हैं। इसलिए खेती के मॉडल भी स्थानीय जरूरतों और प्रकृति के अनुरूप होने चाहिए।
वे बताते हैं कि यहां आम, अमरूद, शहतूत, चीकू, इमली, अंजीर और कटहल जैसे फलदार वृक्षों के साथ आड़ू और खुबानी जैसी प्रजातियों पर भी काम किया जा रहा है। कुछ पौधों में फल आने लगे हैं। अमरूद की अलग-अलग किस्में भी लगाई गई हैं, ताकि उनकी वृद्धि और उत्पादन की संभावनाओं को समझा जा सके।
लेमनग्रास, हल्दी, नींबू, कीनू, संतरा और माल्टा जैसी फसलों के साथ अनार तथा सर्पगंधा जैसे पौधों पर भी प्रयोग किए जा रहे हैं। ड्रैगन फ्रूट जैसी फसल को भी इस मॉडल में शामिल किया गया है। आगे इंटरक्रॉपिंग यानी एक ही खेत में उपयुक्त संयोजन के साथ अलग-अलग फसलें उगाने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।
आचार्य बालकृष्ण के मुताबिक, इस फार्म में लगभग 40 प्रजातियों के अंतर्गत 100 से अधिक किस्मों के पेड़-पौधे लगाने का प्रयास किया गया है। इनमें फलदार वृक्ष, औषधीय वनस्पतियां और अन्य उपयोगी पौधे शामिल हैं।
इस तरह के प्रयोग का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि पहाड़ों में किसानों के पास जमीन अक्सर छोटी-छोटी जोतों में बंटी होती है। हर किसान के लिए नई फसल का प्रयोग करना, उसके पौधे खरीदना, कई वर्षों तक देखभाल करना और फिर उत्पादन की संभावना का इंतजार करना आसान नहीं होता।
यदि किसी स्थान पर अलग-अलग प्रजातियों की खेती के व्यावहारिक परिणाम सामने आ सकें, तो किसान उन्हें देखकर अपने खेतों के लिए उपयुक्त विकल्प चुनने पर विचार कर सकते हैं। इससे नए पौधों को लेकर अनिश्चितता कम करने और खेती में विविधता लाने में मदद मिल सकती है।
यही मालागांव के इस प्रयोग की एक अहम उपयोगिता है – ऐसी संभावनाओं को सामने लाना, जिन्हें पहाड़ के किसान अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपना सकें।
औषधीय पौधों से लेकर फलदार वृक्षों तक, एक मॉडल की तलाश
आचार्य बालकृष्ण का जड़ी-बूटियों से लगाव जगजाहिर है। आयुर्वेद और औषधीय वनस्पतियों के क्षेत्र में उनके लंबे कार्य अनुभव का असर मालागांव में चल रहे इस प्रयोग में भी दिखाई देता है।
यहां उद्देश्य केवल अधिक से अधिक पौधे लगा देना नहीं है। यह समझना भी है कि कौन-सी प्रजाति किस ऊंचाई पर बेहतर ढंग से विकसित हो सकती है, किसे किस तरह की देखभाल चाहिए और कौन-से पौधे पहाड़ के किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।
लगभग साढ़े तीन से चार हजार फीट की ऊंचाई पर विकसित किए जा रहे इस फार्म में अलग-अलग पौधों की संभावनाओं को परखा जा रहा है। औषधीय वनस्पतियों के साथ फलदार पेड़ों और उपयोगी फसलों को शामिल करने के पीछे विचार यह है कि खेती केवल एक फसल या एक मौसम पर निर्भर न रहे।
यदि स्थानीय परिस्थितियां अनुकूल हों, तो किसान अपनी जरूरत, जमीन और बाजार की मांग के हिसाब से अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। औषधीय पौधों की खेती, फल उत्पादन और उपयुक्त फसलों के संयोजन से आय के विविध रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
आचार्य बालकृष्ण का जोर इस बात पर है कि पहाड़ के किसानों को हर प्रयोग अकेले न करना पड़े। पहले से विकसित मॉडल और पौधों की किस्मों को देखकर वे अपनी परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय ले सकें।
यानी यहां खेत के साथ-साथ अनुभव भी तैयार किया जा रहा है।
अनुष्ठान की साधना और श्रम का आनंद
नवरात्रि के नौ दिनों में उपासना और साधना का अपना अनुशासन है। आचार्य बालकृष्ण के बताए कार्यक्रम के अनुसार, दोपहर लगभग 12 बजे तक स्तुति और अनुष्ठान से जुड़े कार्य होते हैं। इसके बाद कुछ समय विश्राम और सूक्ष्म आहार के लिए रखा जाता है। फिर अपराह्न करीब साढ़े तीन बजे से दोबारा उपासना का क्रम शुरू होता है।
इस निर्धारित दिनचर्या के बीच भी वे मालागांव के खेतों, पेड़-पौधों और दुर्गम भूभाग के लिए समय निकाल रहे हैं। यहां एक तरफ आध्यात्मिक साधना है, तो दूसरी ओर प्रकृति के बीच शारीरिक श्रम। रास्ता साफ करना, पौधों की स्थिति देखना, जमीन की उपयोगिता समझना और आगे की खेती की संभावनाओं पर चर्चा करना – ये सभी काम इसी क्रम का हिस्सा हैं।
आचार्य बालकृष्ण इस श्रम को आनंद से जोड़ते हैं। उनके लिए यह आनंद केवल कठिन रास्ते पर चल लेने या किसी दुर्गम स्थान तक पहुंच जाने में नहीं है। आनंद उस काम को आगे बढ़ाने में है, जिससे भविष्य में किसी किसान को लाभ मिल सके, किसी गांव में रोजगार की संभावना बने और किसी उजड़ती जमीन पर फिर से खेती शुरू हो सके।
वे इस पूरी प्रक्रिया को दिखावे के बजाय एक उदाहरण के रूप में सामने रखना चाहते हैं। इसलिए ‘बिफोर एंड आफ्टर’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है। आज जिस स्थान पर मलबा, झाड़ियां और कठिन रास्ते दिखाई दे रहे हैं, वहां काम के बाद क्या बदलाव आता है, इसे तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से दर्ज किया जाएगा।
इससे लोगों को केवल अंतिम परिणाम नहीं, बल्कि उसके पीछे लगे श्रम और समय का भी अंदाजा मिलेगा।
स्वामी रामदेव के प्रयासों से प्रेरित, पहाड़ को समृद्ध बनाने का संकल्प
आचार्य बालकृष्ण कहते हैं कि श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज ने योग और आयुर्वेद को दुनिया तक पहुंचाने के लिए व्यापक पुरुषार्थ किया है। उनके अनुसार, इसी तरह पहाड़ों से पलायन की समस्या को दूर करने के लिए भी निरंतर प्रयासों की जरूरत है।
उनका कहना है कि किसानों को आबाद करने, पहाड़ों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने की दिशा में काम होना चाहिए। मालागांव में चल रहा मॉडल फार्मिंग का प्रयोग इसी सोच से जुड़ा है।
यहां जड़ी-बूटियों, फलदार वृक्षों और विभिन्न उपयोगी पौधों के माध्यम से यह समझने की कोशिश की जा रही है कि पहाड़ी जमीन पर कौन-से विकल्प विकसित किए जा सकते हैं।
आचार्य बालकृष्ण की इच्छा है कि इस तरह के प्रयास केवल मालागांव तक सीमित न रहें। दूसरे क्षेत्रों में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे प्रयोग किए जा सकें, जिससे किसानों को खेती के नए विकल्प मिलें और गांवों में आजीविका की संभावनाएं बढ़ें।
मालागांव का यह प्रयोग इन्हीं संभावनाओं की तलाश में एक कदम है।
अंत में, सवाल सिर्फ रास्ता बनाने का नहीं है
शाम ढलने पर पहाड़ की पगडंडियां फिर शांत हो जाती हैं। झाड़ियों और पत्थरों के बीच निकाला गया रास्ता अभी लंबा सफर तय करेगा। जमीन के कुछ हिस्सों को साफ करना है, कुछ स्थानों पर पौधे लगाने हैं और कई प्रजातियों के विकास को समझना बाकी है। लेकिन किसी भी बदलाव की शुरुआत आखिर एक कदम से ही होती है।
आचार्य बालकृष्ण का दुर्गम रास्ते पर उतरना, सहयोगियों के साथ श्रम करना और खेती की संभावनाएं तलाशना इसी शुरुआत का हिस्सा है। इसका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि कितनी झाड़ियां हटाई गईं या कितने पौधे लगाए गए। असली कसौटी यह होगी कि इन प्रयासों से पहाड़ की जमीन, वहां के किसान और स्थानीय समुदाय किस तरह लाभान्वित होते हैं।
उत्तराखंड के गांवों को फिर से जीवंत बनाने के लिए केवल भावनात्मक अपील काफी नहीं होगी। इसके लिए जमीन पर काम, स्थानीय संसाधनों की समझ, बाजार से जुड़ाव और किसानों के साथ लंबे समय तक चलने वाले प्रयास जरूरी हैं। मालागांव में रास्ता तलाशने की यह कवायद इसी बड़ी चुनौती की ओर इशारा करती है।
क्योंकि पहाड़ में रास्ता बनाना केवल एक स्थान तक पहुंचने का काम नहीं है। कभी-कभी यह उस उम्मीद तक पहुंचने की कोशिश भी होती है, जो वर्षों से उजड़ते गांवों और खाली होते खेतों के बीच कहीं दब गई है।








