मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले से एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बहादुरपुर क्षेत्र में एक 15 वर्षीय आदिवासी लड़की की मौत के बाद उसके परिवार को न केवल दुख का सामना करना पड़ा, बल्कि अंतिम सम्मान तक के लिए संघर्ष करना पड़ा।
जानकारी के अनुसार, मुंगावली ब्लॉक के बहादुरपुर कस्बे के पास स्थित खेरोदा चक्क गांव की रहने वाली किशोरी का शव पोस्टमॉर्टम के बाद अस्पताल से परिवार को सौंप दिया गया। लेकिन इसके बाद जो स्थिति सामने आई, उसने मानवता को झकझोर कर रख दिया। अस्पताल की ओर से न तो शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस या वाहन की व्यवस्था की गई, और न ही स्ट्रेचर या वार्ड बॉय की सुविधा दी गई।
परिवार के सदस्यों का आरोप है कि पोस्टमॉर्टम के बाद शव को ले जाने के लिए उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। यहां तक कि शव को ढकने के लिए अस्पताल द्वारा कोई कफन या प्लास्टिक शीट तक उपलब्ध नहीं कराई गई। मजबूरी में परिवार को अपने ही कपड़ों में शव को लपेटना पड़ा।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि परिजन खुद ही शव को कंधों पर उठाकर अस्पताल से बाहर निकले। चिलचिलाती गर्मी, जहां तापमान करीब 41 डिग्री सेल्सियस था, उस दौरान वे शव को लेकर सड़क किनारे पहुंचे और किसी वाहन की तलाश में मदद मांगने लगे। लेकिन कई घंटों तक कोई भी वाहन चालक उन्हें ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ, भले ही उन्होंने पैसे देने की बात कही।
करीब दो घंटे तक शव सड़क किनारे पड़ा रहा और परिवार मदद की गुहार लगाता रहा। इस दौरान प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं पहुंची। यह घटना न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को उजागर करती है, बल्कि गरीब और आदिवासी परिवारों के प्रति व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी दर्शाती है।
बाद में एक स्थानीय समाजसेवी, आदित्य त्रिवेदी, को जब इस घटना की जानकारी मिली, तो उन्होंने मौके पर पहुंचकर अपनी निजी गाड़ी से शव को गांव तक पहुंचाने में मदद की। उनके इस कदम की स्थानीय लोगों ने सराहना की, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया कि जब सरकारी व्यवस्था मौजूद है, तो इस तरह की स्थिति क्यों उत्पन्न हुई।
इस मामले को लेकर स्थानीय लोगों में आक्रोश है और प्रशासन से जवाबदेही की मांग की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से जब इस बारे में पूछा गया, तो जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने की कोशिश नजर आई, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है।
यह घटना बताती है कि जमीनी स्तर पर अब भी कई जगहों पर बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। खासकर गरीब और आदिवासी समुदायों को अक्सर ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जहां उन्हें अपने अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।








