राम चरण की ‘पेड्डी’ बॉक्स ऑफिस पर धमाकेदार प्रदर्शन जारी, 250 करोड़ क्लब की ओर तेज़ी से बढ़ी फिल्म वायनाड में आदिवासी कल्याण योजना में कथित 50 लाख रुपये की अनियमितता, जांच रिपोर्ट से मचा राजनीतिक बवाल दिल्ली होटल अग्निकांड में मृतकों की संख्या बढ़कर 22, नाइजीरियाई नागरिक ने इलाज के दौरान तोड़ा दम दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर हत्याकांड का खुलासा, 1,400 किलोमीटर दूर से आए दंपति गिरफ्तार खान सर को एफआईआर मामले में अग्रिम जमानत की तैयारी, कोचिंग सेंटर विवाद ने पकड़ा तूल तमिलनाडु में शराब बिक्री व्यवस्था पर बड़ा एक्शन, मुख्यमंत्री विजय ने कथित ‘पार्टी फंड’ सिस्टम पर कसा शिकंजा

वायनाड में आदिवासी कल्याण योजना में कथित 50 लाख रुपये की अनियमितता, जांच रिपोर्ट से मचा राजनीतिक बवाल

केरल के वायनाड जिले में आदिवासी समुदाय के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही वन धन विकास योजना (VDVY) में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। आंतरिक जांच में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी कल्याण के लिए आवंटित करीब 50 लाख रुपये का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के बजाय अन्य माध्यमों से किया गया। मामले के सामने आने के बाद संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।

वन धन विकास योजना का उद्देश्य आदिवासी समुदायों को वन उत्पादों के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन के माध्यम से रोजगार और आय के अवसर उपलब्ध कराना है। इस योजना के तहत विभिन्न क्षेत्रों में वन धन विकास केंद्र स्थापित किए जाते हैं, जहां स्थानीय आदिवासी परिवारों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।

जांच रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 से 2023 के बीच योजना से जुड़े कुछ वित्तीय लेनदेन में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। आरोप है कि योजना के लिए जारी धनराशि का एक हिस्सा सीधे कुछ कर्मचारियों के खातों में स्थानांतरित किया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ भुगतान डिजिटल माध्यमों के जरिए किए गए, जिससे धन के उपयोग को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।

मामले में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनमें Jayesh, Harish और Sai Krishna शामिल हैं। जांच के बाद संबंधित कर्मचारियों को सेवा से हटाए जाने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि आरोपों की अंतिम पुष्टि विस्तृत जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि जिन पंचायत क्षेत्रों में योजना के तहत केंद्र संचालित होने चाहिए थे, उनमें से कुछ स्थानों पर केंद्रों के प्रभावी संचालन के प्रमाण नहीं मिले। इसके अलावा कई आवश्यक रिकॉर्ड, बिल, वाउचर और अन्य दस्तावेज उपलब्ध नहीं पाए गए। इससे योजना के तहत हुए खर्च और वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंची राशि को लेकर संदेह बढ़ गया है।

जांच अधिकारियों ने यह भी पाया कि वन उत्पादों के संग्रहण और बिक्री से आय तो हुई, लेकिन उसका पूरा लाभ संबंधित केंद्रों या लाभार्थियों तक नहीं पहुंचा। आरोप है कि राजस्व का केवल सीमित हिस्सा ही आधिकारिक खातों में जमा हुआ। यही कारण है कि अब पूरे वित्तीय लेनदेन की गहन समीक्षा की जा रही है।

इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह माना जा रहा है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका सीधा असर उन आदिवासी परिवारों पर पड़ा होगा जिनके लिए यह योजना शुरू की गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है, क्योंकि ऐसी योजनाएं समाज के कमजोर वर्गों के विकास से जुड़ी होती हैं।

राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दल इस मुद्दे पर जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, जबकि संबंधित पक्षों की ओर से अभी विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। प्रशासन का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और यदि किसी स्तर पर वित्तीय अनियमितता या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

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