अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर नई कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिकी नेतृत्व ने अपने सहयोगी देशों से इस अहम समुद्री मार्ग की सुरक्षा में सहयोग देने की अपील की थी, लेकिन कई प्रमुख देशों ने फिलहाल सैन्य भागीदारी से दूरी बनाते हुए सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है।
अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने सहयोगी देशों से आग्रह किया था कि वे खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और संभावित खतरों को देखते हुए समुद्री सुरक्षा अभियान में शामिल हों। खासकर दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में से एक माने जाने वाले Strait of Hormuz की सुरक्षा को लेकर अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश की।
हालांकि इस पहल को लेकर कई सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया अपेक्षित समर्थन जैसी नहीं रही। जापान और ऑस्ट्रेलिया ने फिलहाल इस सैन्य पहल में सीधे तौर पर शामिल होने से इनकार कर दिया है। इन देशों का कहना है कि वे क्षेत्र में तनाव को और बढ़ाने वाले किसी भी कदम से बचना चाहते हैं और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहते हैं।
जापान के अधिकारियों ने संकेत दिया कि उनका देश ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंतित जरूर है, लेकिन वे क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई के बजाय शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में हैं। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया ने भी कहा है कि वह स्थिति पर नजर बनाए हुए है, लेकिन तत्काल किसी सैन्य मिशन में शामिल होने की योजना नहीं है।
दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया ने इस मामले में संतुलित रुख अपनाया है। सियोल ने कहा है कि वह प्रस्ताव पर विचार करेगा और अपने राष्ट्रीय हितों तथा क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आगे का फैसला लिया जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव वैश्विक बाजारों और ऊर्जा आपूर्ति पर असर डाल सकता है।
पिछले कुछ समय से अमेरिका और Iran के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियों और बयानों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सहयोगी देशों का सतर्क रुख यह दिखाता है कि वे मध्य पूर्व में किसी बड़े सैन्य टकराव से बचना चाहते हैं। कई देशों का मानना है कि मौजूदा हालात में कूटनीतिक बातचीत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही स्थायी समाधान का रास्ता हो सकता है।









