अलविदा सोनाकली… कॉर्बेट की वीरांगना, साहस की अमर कहानी
दैनिक समाचार, हरिद्वार/रामनगर: कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की लगभग 80 वर्षीय हथिनी सोनाकली ने 17 अक्टूबर 2026 की रात लगभग 10:45 बजे अंतिम सांस ली। पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उसे अंतिम विदाई दी गई। लेकिन सोनाकली की विदाई केवल एक हथिनी का जाना नहीं बल्कि कॉर्बेट के जंगलों के इतिहास के एक गौरवशाली अध्याय का अंत है। उसकी सेवाएं, साहस और वन्यजीव संरक्षण में योगदान हमेशा याद किया जाएगा।
सोनाकली के साहस की तीन ऐतिहासिक कहानियां
2011 में गर्जिया में आदमखोर बाघ का रेस्क्यू अभियान में सोनाकली ने अहम भूमिका निभाई और अपनी बहादुरी से कॉर्बेट की पहचान बनीं।
2012 में बाघ के मुंह से शव वापस लाने का साहसिक अभियान सर्पदुली रेंज में सोनाकली ने की। बाघ के हमले में जान गंवाने वाले दीवानी राम के शव को बाघ के मुंह से निकालकर लाने में सोनाकली ने अद्भुत साहस और सूझबूझ का परिचय दिया। यह हथनी के जीवन के सबसे उल्लेखनीय और जोखिम भरे अभियानों में से एक था।
जंगल की गश्त और रेस्क्यू अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान
बाघों के रेस्क्यू अभियानों और जंगल में गश्त के दौरान कई अवसरों पर सोनाकली ने अन्य हाथियों और चारा काटने वाले श्रमिकों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई। उसकी मौजूदगी वन विभाग के कठिन अभियानों में बेहद महत्वपूर्ण रही।
सोनाकली केवल एक हथिनी नहीं थीं…
वह वन विभाग की साथी, मानव-वन्यजीव संघर्ष के कठिन दौर की साहसी सहयोगी और कॉर्बेट की अनमोल विरासत थीं। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि वन्यजीव संरक्षण में जानवरों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण और सम्माननीय है। आज सोनाकली हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहादुरी के किस्से और जंगल के लिए उनकी सेवाएँ आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी।
1997 में कार्बेट टाइगर रिजर्व लाई गई थी
हथिनी सोनाकली को साल 1997 में कार्बेट टाइगर रिजर्व में लाया गया था। इसके बाद साल 1997 से 2002 तक ढिकाला रेंज, 2002 से 2016 तक हल्दूपड़ाव व कालागढ़ तथा साल 2016 से सेवा निवृत्ति तक ढिकाला रेंज में सेवाएं दीं।
कार्बेट ने विदाई देते हुए सोशल मीडिया पर यह लिखा
भावभीनी श्रद्धांजलि-सोनाकली।
तुम्हारी विदाई राजकीय सम्मान के साथ हुई, लेकिन तुम्हारा सम्मान हमेशा कॉर्बेट के जंगलों और लोगों के दिलों में जीवित रहेगा।








