हरीश रावत बनाम कांग्रेस संगठन की खींचतान के बीच 7 अक्टूबर को दिल्ली में बैठक, हाईकमान के रुख पर नजर

हरीश रावत की ताकत के साथ चलेगी कांग्रेस या संगठन की खींचेगी

सियासी हलचल मचाने वाले ‘हरदा’ की ताकत को साथ लेकर चलेगी कांग्रेस या संगठन के आगे खींचेगी लकीर, सात को होगा फैसला

  • ईडी के नोटिस से शुरू हुआ सियासी घटनाक्रम अब कांग्रेस के अंदरूनी शक्ति संतुलन तक पहुंचा
  • संगठन से दूरी ने बढ़ाई खींचतान, 7 अक्टूबर की दिल्ली मुलाकात पर टिकी नजरें
  • रावत की लोकप्रियता कांग्रेस के लिए राजनीतिक पूंजी बनेगी या अंदरूनी चुनौती, तय करेगा हाईकमान

नवीन पाण्डेय, देहरादून/नई दिल्ली। उत्तराखंड कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती हरीश रावत की राजनीतिक सक्रियता को पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के साथ संतुलित करने की है। यदि कांग्रेस हाईकमान रावत की लोकप्रियता और राजनीतिक प्रभाव को पार्टी के पक्ष में इस्तेमाल करने में सफल होता है तो मौजूदा घटनाक्रम कांग्रेस के लिए राजनीतिक पूंजी साबित हो सकता है। रावत जैसे अनुभवी नेता को सक्रिय रखकर पार्टी भाजपा के खिलाफ अपने पुराने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन यदि दिल्ली की बैठक के बाद मतभेद और गहरे होते हैं तो यही शक्ति प्रदर्शन कांग्रेस की अंदरूनी कलह को और सार्वजनिक कर सकता है। राजनीति में भीड़ हमेशा संगठन की ताकत का प्रमाण नहीं होती और संगठन हमेशा जनाधार का विकल्प नहीं होता। उत्तराखंड कांग्रेस के सामने फिलहाल चुनौती इन्हीं दोनों के बीच संतुलन बनाने की है।

यही वजह है कि अब सबकी निगाहें सात अक्टूबर को होने वाली हरीश रावत और कांग्रेस हाईकमान की मुलाकात पर टिकी हैं। ईडी के नोटिस के खिलाफ सड़क पर उतरने से शुरू हुआ यह पूरा घटनाक्रम अब सिर्फ केंद्रीय एजेंसी के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है। इसने प्रदेश कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संगठन और व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव के बीच चल रही खींचतान को भी सतह पर ला दिया है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से उबरने के बाद रावत की अचानक बढ़ी राजनीतिक सक्रियता और इसके बाद हाईकमान का उन्हें दिल्ली बुलाना उत्तराखंड कांग्रेस की भावी राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

ईडी के नोटिस से राजनीतिक सक्रियता तक

ईडी के नोटिस को लेकर हरीश रावत ने जिस तरह सड़क पर उतरकर अपनी राजनीतिक सक्रियता दिखाई, उससे उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई को वे केवल कानूनी मामला नहीं मानते, बल्कि इसे व्यापक राजनीतिक संदर्भ में भी देख रहे हैं। उनके कार्यक्रमों में जुटी भीड़ और आक्रामक तेवरों ने प्रदेश की सियासत का तापमान बढ़ा दिया।

रावत की इस सक्रियता को महज विरोध प्रदर्शन के तौर पर देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। इसके जरिए उन्होंने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। पहला संदेश भाजपा और केंद्र सरकार के खिलाफ था। दूसरा संदेश अपने समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए था कि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद वे राजनीतिक मैदान से बाहर नहीं हुए हैं। लेकिन तीसरा और सबसे अहम संदेश कांग्रेस के भीतर उनकी राजनीतिक हैसियत को लेकर था।

रावत ने अपने राजनीतिक प्रभाव का प्रदर्शन ऐसे समय किया, जब उत्तराखंड कांग्रेस पहले से ही नेतृत्व और संगठन के स्तर पर कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है। यही वजह है कि उनकी सक्रियता को कांग्रेस के भीतर भी अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है।

संगठन से दूरी ने दिखाए ‘हरदा’ को तेवर

पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू हरीश रावत के कार्यक्रमों से प्रदेश कांग्रेस संगठन और पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं की दूरी रही। सामान्य परिस्थितियों में किसी वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में पार्टी संगठन की सक्रिय भागीदारी स्वाभाविक मानी जाती है। लेकिन यहां तस्वीर कुछ अलग दिखाई दी।

संगठन की सीमित भागीदारी ने सवाल खड़ा किया कि क्या हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस संगठन के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ रही है? या फिर कांग्रेस नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि पार्टी की राजनीतिक दिशा और कार्यक्रम सामूहिक संगठनात्मक निर्णयों से तय होंगे, किसी एक नेता की व्यक्तिगत राजनीतिक पहल से नहीं?

यही सवाल अब सात अक्टूबर की दिल्ली मुलाकात को और महत्वपूर्ण बना रहा है। हाईकमान के सामने सिर्फ रावत की नाराजगी या राजनीतिक सक्रियता का मुद्दा नहीं होगा, बल्कि यह भी सवाल होगा कि उत्तराखंड कांग्रेस में व्यक्तिगत जनाधार और संगठनात्मक अनुशासन के बीच किस तरह का संतुलन बनाया जाए।

‘हरदा’ की पुरानी राजनीति फिर चर्चा में

उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की पहचान ऐसे नेता की रही है, जो संगठन की पारंपरिक सीमाओं के भीतर रहते हुए भी अपनी अलग राजनीतिक शैली बनाए रखते हैं। जनता के बीच सीधे पहुंचना, स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक हथियार बनाना और अपने समर्थकों का अलग नेटवर्क सक्रिय रखना उनकी राजनीति की खासियत रही है।
यही शैली कई बार उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी तो कई बार पार्टी के भीतर असहजता का कारण भी। उत्तराखंड कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन को लेकर खींचतान कोई नई बात नहीं है। लेकिन हरीश रावत की सक्रियता हर बार इस सवाल को फिर सामने ले आती है कि प्रदेश कांग्रेस में वास्तविक राजनीतिक प्रभाव किसके पास है। संगठन के पास या उन बड़े नेताओं के पास, जिनका अपना जनाधार है।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में कुछ बड़े नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान कई बार पार्टी संगठन से भी बड़ी दिखाई देती है। रावत इसी राजनीतिक परंपरा के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक हैं।

क्या ईडी का नोटिस बना राजनीतिक मंच

हरीश रावत की ताकत के साथ चलेगी कांग्रेस या संगठन की खींचेगी लकीर 7 अक्टूबर की दिल्ली बैठक पर नजर

ईडी के नोटिस के बाद हरीश रावत का जनता के बीच जाना इस पूरे घटनाक्रम का अहम पहलू रहा। जांच एजेंसी की कार्रवाई के बीच उन्होंने जिस तरह राजनीतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया, उससे उनके समर्थकों को उनके खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक संघर्ष के रूप में पेश करने का अवसर मिला।
इसका राजनीतिक लाभ रावत को मिला या नहीं, यह आने वाला समय तय करेगा, लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक मौजूदगी को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया।

दूसरी ओर भाजपा इस घटनाक्रम को कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी और संगठनात्मक अनुशासन के सवाल से जोड़ सकती है। यानी एक ही घटनाक्रम को कांग्रेस समर्थक राजनीतिक संघर्ष के रूप में देख रहे हैं, जबकि भाजपा के लिए यह कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन के बीच खींचतान का मुद्दा बन सकता है।

दिल्ली बुलावे ने बढ़ाई सियासी हलचल

अब सबसे अहम पड़ाव सात अक्टूबर की दिल्ली मुलाकात है। कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत को दिल्ली बुलाया है और रावत ने भी सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि की है। ऐसे में यह मुलाकात उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में आगे की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है।
सवाल यह है कि हाईकमान रावत की राजनीतिक सक्रियता को संगठन के लिए चुनौती के रूप में देखता है या इसे उत्तराखंड में पार्टी की ताकत के रूप में इस्तेमाल करने का रास्ता तलाशता है।

क्या रावत से भविष्य में संगठन के साथ बेहतर समन्वय बनाने को कहा जाएगा? क्या प्रदेश कांग्रेस के भीतर उनकी राजनीतिक भूमिका को स्पष्ट किया जाएगा? या फिर हाईकमान उनकी लोकप्रियता और उत्तराखंड में उनके प्रभाव को देखते हुए उनके साथ नया राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। इन सवालों के जवाब सात अक्टूबर की बातचीत के बाद ही स्पष्ट होंगे।

कांग्रेस के लिए अवसर भी, चुनौती भी

हरीश रावत की मौजूदा सक्रियता कांग्रेस के लिए दोहरी स्थिति पैदा करती है। एक तरफ उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव है, उत्तराखंड की राजनीति की गहरी समझ है और जनता के बीच उनकी पहचान अब भी बनी हुई है। ऐसे नेता को सक्रिय रखना कांग्रेस के लिए भाजपा के खिलाफ राजनीतिक मुकाबले में उपयोगी साबित हो सकता है।
दूसरी तरफ उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक शैली संगठन के लिए चुनौती भी बन सकती है। यदि उनके कार्यक्रम पार्टी की आधिकारिक रणनीति से अलग दिखाई देते हैं तो इससे कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच नेतृत्व को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।

इसलिए कांग्रेस हाईकमान के सामने रास्ता किसी एक पक्ष को मजबूत करने का नहीं, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलने का है। रावत की लोकप्रियता को पार्टी की ताकत बनाया जाए और संगठन को यह भरोसा दिया जाए कि सामूहिक निर्णय प्रक्रिया सर्वोपरि रहेगी।

7 अक्टूबर की दिल्ली में ‘हरदा’ की मुलाकात, सबकी निगाह

हरीश रावत की दिल्ली में होने वाली मुलाकात को इसलिए महज एक संगठनात्मक बैठक के तौर पर नहीं देखा जा रहा। यह बैठक इस बात का संकेत दे सकती है कि कांग्रेस हाईकमान उत्तराखंड में रावत की भूमिका को किस नजर से देखता है और प्रदेश कांग्रेस की भावी राजनीति में उन्हें कितनी जगह देने के लिए तैयार है।
संभव है कि बैठक के बाद रावत और संगठन के बीच बेहतर समन्वय की कोशिश सामने आए। यह भी संभव है कि हाईकमान उन्हें पार्टी के व्यापक राजनीतिक अभियान में सक्रिय भूमिका देने का फैसला करे। लेकिन यदि बातचीत से कोई स्पष्ट समाधान नहीं निकलता और दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक रुख पर कायम रहते हैं तो उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान आने वाले दिनों में और खुलकर सामने आ सकती है।

फिलहाल असली सवाल यही है कि हरीश रावत का यह शक्ति प्रदर्शन कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक ऊर्जा बनेगा या उत्तराखंड कांग्रेस की पुरानी अंदरूनी खींचतान को एक बार फिर खुली सड़क पर ले आएगा। सात अक्टूबर की दिल्ली बैठक इस सवाल का जवाब देने की दिशा में पहला बड़ा संकेत जरूर दे सकती है।

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