कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना को लेकर तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। मुख्यमंत्री विजय ने गुरुवार को विधानसभा में एक विशेष प्रस्ताव पेश करते हुए इस परियोजना का कड़ा विरोध किया और सभी राजनीतिक दलों से राज्य के हित में एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका और राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार है। ऐसे में तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा करना सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
विधानसभा में प्रस्ताव पेश करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जनता के हितों से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर सभी दलों को एक साथ खड़ा होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी सरकार राज्य के किसानों और आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
प्रस्ताव में केंद्र सरकार से मांग की गई है कि वह कर्नाटक की मेकेदातु परियोजना को किसी भी प्रकार की मंजूरी न दे। साथ ही परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (डीपीआर) पर कोई कार्रवाई या समीक्षा भी न की जाए। इसके अलावा केंद्र से यह भी आग्रह किया गया है कि वह कर्नाटक सरकार को इस परियोजना पर आगे नहीं बढ़ने की सलाह दे।
मुख्यमंत्री विजय ने अपने संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2018 के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कावेरी नदी पर किसी नई जल परियोजना या जलाशय के निर्माण से पहले निचले क्षेत्रों वाले राज्यों के हितों को ध्यान में रखने की बात कही गई थी। उनका कहना था कि तमिलनाडु एक निचला राज्य होने के नाते उसके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
प्रस्ताव में यह चिंता जताई गई कि यदि मेकेदातु परियोजना को मंजूरी मिलती है तो इससे तमिलनाडु के हिस्से में आने वाले कावेरी जल पर असर पड़ सकता है। इससे सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और डेल्टा क्षेत्र के लाखों किसानों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका है। खासकर कम वर्षा वाले वर्षों में जल वितरण की स्थिति और जटिल हो सकती है।
विधानसभा में विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया। विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने केंद्र सरकार से कावेरी से जुड़े मामलों के समाधान के लिए एक विशेष न्यायाधिकरण गठित करने की मांग को प्रस्ताव में शामिल करने का सुझाव दिया, जिसे मुख्यमंत्री ने स्वीकार कर लिया। इससे सदन में इस मुद्दे पर व्यापक सहमति देखने को मिली।
कावेरी जल विवाद कई दशकों से दक्षिण भारत के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक रहा है। जल बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। तमिलनाडु का आरोप रहा है कि कम वर्षा वाले वर्षों में उसे अपने हिस्से का पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता, जबकि कर्नाटक का कहना है कि वह अपने जल संसाधनों का उपयोग अपने नागरिकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करता है।
कर्नाटक सरकार का तर्क है कि मेकेदातु परियोजना मुख्य रूप से बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों की बढ़ती पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रस्तावित की गई है। हालांकि तमिलनाडु का मानना है कि इस परियोजना से ऊपरी हिस्से में पानी का अधिक भंडारण होगा, जिससे नीचे के राज्यों को मिलने वाले पानी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है क्योंकि दोनों राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग समीकरणों से प्रभावित हैं। बावजूद इसके, तमिलनाडु सरकार ने साफ किया है कि राज्य के जल अधिकारों की रक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जाएगा।








