उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी तेज, GLOF के खतरे से निपटने के लिए वासुंधरा ताल से शुरू हुआ अभियान SIR विवाद के बीच INDIA ब्लॉक की आज अहम बैठक, ज्ञानेश कुमार पर आगे की कार्रवाई को लेकर बनेगी रणनीति कांग्रेस की CWC बैठक में नीतीश कुमार को लेकर मतभेद, सोनिया गांधी ने दिग्विजय सिंह की टिप्पणी पर दी तीखी प्रतिक्रिया भारत की वनस्पति विरासत के संरक्षण में पतंजलि की बड़ी पहल, 27 हजार से अधिक पादप नमूने संरक्षित और 100+ नए रिकॉर्ड दर्ज कालिंदी खाल ट्रेक पर फंसे सभी ट्रेकर्स का सफल रेस्क्यू, SDRF ने सुरक्षित निकाला उत्तराखंड में चारधाम यात्रा ने रचा नया रिकॉर्ड, 53 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी तेज, GLOF के खतरे से निपटने के लिए वासुंधरा ताल से शुरू हुआ अभियान

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उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए राज्य सरकार ने वैज्ञानिक निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस अभियान की शुरुआत चमोली जिले स्थित वासुंधरा ताल से की गई है। यहां अत्याधुनिक सेंसर, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और रियल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग की मदद से झील में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जाएगी।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी हिमनदीय झील में जमा पानी अचानक बांध या प्राकृतिक अवरोध टूटने के कारण तेजी से बाहर निकलता है और निचले इलाकों में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है।

वासुंधरा ताल से शुरू हुई वैज्ञानिक पहल

उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने देहरादून से वासुंधरा ताल के लिए रवाना होने वाली वैज्ञानिक और तकनीकी टीम को हरी झंडी दिखाई। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की यह पहल GLOF के जोखिम को समझने और उससे निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

उन्होंने बताया कि आधुनिक सेंसर और उपग्रह आधारित संचार व्यवस्था के जरिए झीलों में होने वाले बदलावों की जानकारी अधिक तेजी से हासिल की जा सकेगी। रियल-टाइम डेटा उपलब्ध होने से संभावित खतरे का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर समय रहते संबंधित एजेंसियों को अलर्ट करने में मदद मिल सकती है।

13 झीलें हाई रिस्क श्रेणी में

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और तकनीकी संस्थानों की पहचान के अनुसार उत्तराखंड में 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया गया है। इनमें चमोली जिले की चार, पिथौरागढ़ की छह, बागेश्वर की एक, टिहरी की एक और उत्तरकाशी की एक झील शामिल है।

वासुंधरा ताल भी इन्हीं संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में शामिल है। इसके अलावा राज्य में मौजूद अन्य ग्लेशियल झीलों की स्थिति को समझने और संभावित जोखिम का आकलन करने के लिए भी वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

344 ग्लेशियल झीलों की हुई पहचान

राज्य के आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के वर्ष 2023 के आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है।

इनमें से 13 झीलों को विशेष रूप से उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों की निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी क्षेत्र में तापमान, ग्लेशियरों में बदलाव और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण झीलों के आकार तथा उनमें जमा पानी की मात्रा में परिवर्तन हो सकता है।

छह झीलों का हो चुका है बाथिमेट्रिक सर्वे

अधिकारियों के मुताबिक, चिन्हित 13 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों में से छह का बाथिमेट्रिक सर्वे पहले ही पूरा किया जा चुका है। इस वैज्ञानिक सर्वेक्षण के जरिए झील की गहराई, जल की मात्रा और उसके तल की संरचना जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई जाती हैं।

सर्वेक्षण पूरा की गई झीलों में चमोली जिले की सरस्वती ताल और वासुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की माबांग, प्यूनग्रू और स्यूक्ति यांक्ति झीलें शामिल हैं।

15 अक्टूबर तक चलेगा अभियान

वासुंधरा ताल में निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के लिए शुरू किया गया यह अभियान 15 अक्टूबर तक चलने वाला है। इसे उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) की ओर से नेशनल GLOF रिस्क रिडक्शन प्रोग्राम के तहत संचालित किया जा रहा है।

यह उत्तराखंड में किसी ग्लेशियल झील पर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में भेजी गई पहली वैज्ञानिक टीम बताई गई है।

वैज्ञानिक संस्थानों के विशेषज्ञ भी अभियान में शामिल

अभियान में वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम शामिल है। इसमें रुड़की स्थित सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) और देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के विशेषज्ञ शामिल हैं।

टीम को दुर्गम और ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में काम करने के दौरान सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन से जुड़े सहयोग के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के personnel भी साथ रहेंगे।

आधुनिक तकनीक से मिलेगी समय रहते चेतावनी

इस परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करना है। सेंसर से प्राप्त जानकारी, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और रियल-टाइम डेटा के जरिए झील की स्थिति में होने वाले असामान्य बदलावों को समझने में सहायता मिलेगी।

यदि किसी झील में पानी का स्तर, संरचना या अन्य महत्वपूर्ण परिस्थितियों में अचानक बदलाव सामने आता है, तो ऐसी जानकारी आपदा प्रबंधन तंत्र के लिए प्रारंभिक चेतावनी तैयार करने में उपयोगी हो सकती है।

मुख्यमंत्री ने वैज्ञानिक निगरानी को बताया जरूरी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अभियान पर रवाना हुई टीम को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि हिमालयी झीलों से जुड़े संभावित खतरों को लेकर लगातार सतर्क रहना जरूरी है। राज्य सरकार का लक्ष्य उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आधुनिक निगरानी और अर्ली वार्निंग व्यवस्था को और मजबूत करना है।

इसके लिए वैज्ञानिक संस्थानों, विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया जा रहा है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को देखते हुए ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को आपदा प्रबंधन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है GLOF की निगरानी?

ग्लेशियल झीलें अक्सर ग्लेशियरों के पीछे जमा पानी से बनती हैं। यदि किसी झील का प्राकृतिक अवरोध कमजोर होता है और अचानक टूटता है, तो कम समय में बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है। इससे नदी घाटियों और आसपास के क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

इसी वजह से जोखिम वाली झीलों की पहचान, उनका वैज्ञानिक सर्वेक्षण, नियमित निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली तकनीक विकसित करना महत्वपूर्ण है। वासुंधरा ताल से शुरू हुआ यह अभियान उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऐसे जोखिमों की वैज्ञानिक समझ और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

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