कैमरों से दूर दुर्गम गांवों में लिखी गई ‘आदिग्राम’ की असली कहानी
- उत्तराखंड के पंतनगर में सम्मान के मंच से कहीं बड़ी है दुर्गम गांवों में हुई इस काम की कहानी
- अब 65 हजार जनजातीय लोगों का 100 प्रतिशत जियो-टैगिंग ने गांवों को डिजिटल नक्शे पर उतारा
- अब अनुमान नहीं, डेटा तय करेगा गांवों के विकास की दिशा, इसे पतंजलि ने मुमकिन किया
चार अक्टूबर को गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डॉ. रतन सिंह सभागार में जब ‘आदिग्राम’ लाभार्थी संवाद एवं सम्मान समारोह में 300 स्वयं सहायता समूह की महिलाओं, 42 ग्राम प्रधानों और पतंजलि की 20 से अधिक योग शिक्षिकाओं को सम्मानित किया जा रहा था तब मंच पर मौजूद लोग सिर्फ एक परियोजना की सफलता का उत्सव नहीं मनाया जा रहा था बल्कि वहां एक ऐसे कार्य की कहानी लिखी जा रही थी जिसकी मेहनत शायद कैमरों की नजर से दूर, उत्तराखंड के दुर्गम जनजातीय गांवों में हुई थी।
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय (भारत सरकार) और जनजाति कल्याण निदेशालय, उत्तराखंड के सहयोग से दिव्य योग मंदिर न्यास की ओर से संचालित ‘Techno-enabled AdiGram’ परियोजना ने इन गांवों तक पहुंचकर एक ऐसा डिजिटल आधार तैयार किया है जो आने वाले वर्षों में जनजातीय क्षेत्रों के विकास की दिशा बदलने में मददगार हो सकता है। समारोह की अध्यक्षता पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आचार्य बालकृष्ण ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिवेंद्र कुमार कश्यप मौजूद रहे। लेकिन इस समारोह की असली कहानी सम्मान पाने वाले चेहरों से कहीं आगे जाती है।
असली चुनौती थी, उन्हें ढूंढना और डिजिटल नक्शे तक लाना
शहर में बैठे किसी व्यक्ति के लिए 17 हजार परिवारों का डिजिटल डेटाबेस तैयार करना शायद एक सामान्य आंकड़ा लगे। लेकिन जब यही काम उत्तराखंड के दूर-दराज और दुर्गम क्षेत्र स्थित जनजातीय बहुल गांवों में करना हो जहां भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं, बस्तियां दूर-दूर तक फैली हैं और हर परिवार तक पहुंचना अपने आप में चुनौती है तब यह आंकड़ा एक बड़े अभियान की तस्वीर सामने लाता है। ‘आदिग्राम’ के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं था कि कितने परिवार हैं।
पहले यह पता करना था कि कौन कहां रहता है, उसकी आजीविका क्या है, गांव में कौन-कौन सी प्रमुख परिसंपत्तियां हैं और इन सबको डिजिटल सिस्टम से कैसे जोड़ा जाए। यानी काम कागज पर आंकड़े इकट्ठा करने से कहीं आगे था। इसके बाद आया जियो-टैगिंग का चरण और यहीं से इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धि सामने आती है।
65 हजार जनजातीय नागरिक अब डिजिटल रिकॉर्ड में

‘Techno-enabled AdiGram’ के तहत उत्तराखंड के 64 जनजाति बहुल गांवों का चयन किया गया। इनमें अकेले ऊधम सिंह नगर के ही 42 गांव शामिल थे। परियोजना के तहत 17 हजार से अधिक परिवारों और लगभग 65 हजार जनजातीय नागरिकों का डिजिटल एवं जियो-टैग्ड डेटाबेस तैयार किया गया और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि सभी परिवारों और प्रमुख ग्राम परिसंपत्तियों की 100 प्रतिशत जियो-टैगिंग पूरी की गई। इसका मतलब केवल इतना नहीं है कि इन परिवारों के नाम किसी डिजिटल फाइल में दर्ज हो गए। सरल शब्दों में कहें तो जिन गांवों और परिवारों तक विकास की योजनाएं पहुंचानी हैं उनकी डिजिटल लोकेशन और पहचान अब एक व्यवस्थित डेटा सिस्टम में मौजूद है। यही वह बदलाव है जो आदिग्राम को महज एक सर्वे या सरकारी योजना से अलग बनाता है।
विकास की योजना अब अनुमान से नहीं, डेटा से
किसी गांव के विकास के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि वहां वास्तव में क्या है और क्या जरूरत है। किस गांव में कितने परिवार हैं। कितने लोग खेती करते हैं। किस परिवार को आजीविका के अवसर चाहिए। कहां प्रशिक्षण की जरूरत है। कौन सा परिवार सरकारी योजना के लिए पात्र हैं। गांव में कौन-कौन सी परिसंपत्तियां मौजूद हैं। जब इन सवालों के जवाब एक डिजिटल डेटाबेस में मिलते हैं तो विकास की योजना भी ज्यादा सटीक तरीके से बनाई जा सकती है। इसी सोच के साथ सभी 64 गांवों के लिए साक्ष्य-आधारित विकास योजनाएं तैयार की गईं। यानी अब विकास का आधार सिर्फ यह नहीं होगा कि किसी गांव के बारे में सामान्य तौर पर क्या माना जाता है, बल्कि यह भी होगा कि जमीन पर मौजूद डेटा क्या कहता है।
सिर्फ डेटाबेस नहीं, गांवों को अवसरों से जोड़ने की कोशिश
‘आदिग्राम’ की कहानी केवल डिजिटल डेटा तक सीमित नहीं है। 5,000 से अधिक किसानों को डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया। 15,000 से अधिक लोगों को आजीविका और कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया गया। 200 से अधिक जनजातीय शिल्पकारों को इरुला ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया ताकि उनके उत्पाद स्थानीय बाजार से निकलकर डिजिटल बाजार तक पहुंच सकें। इसके अलावा 50 प्रतिशत से अधिक परिवारों को उनकी पात्रता के अनुसार सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास किया गया। डिजिटल डेटाबेस को केवल रिकॉर्ड बनाकर छोड़ने के बजाय उसे कृषि, रोजगार, कौशल, बाजार और सरकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश की गई। यही आदिग्राम की असली सोच है।
यह सिर्फ 64 गांवों की कहानी नहीं
‘आदिग्राम’ की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद 17 हजार परिवार या 65 हजार लोगों का आंकड़ा नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उत्तराखंड के 64 जनजातीय बहुल गांवों को डिजिटल रूप से समझने और उनके विकास की योजना को डेटा से जोड़ने का एक आधार तैयार हुआ है। इसीलिए चार अक्टूबर का पंतनगर समारोह केवल सम्मान समारोह नहीं था। वह उस यात्रा का सार्वजनिक पड़ाव था जिसमें दुर्गम जनजातीय बस्तियों से शुरू होकर 65 हजार लोगों को डिजिटल नक्शे तक लाने और फिर उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की गई। हो सकता है आने वाले वर्षों में जब इन 64 गांवों में विकास की नई तस्वीर दिखाई दे तब उसकी नींव में आज तैयार किया गया यही डिजिटल डेटा सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा हो।
पंतनगर से दिखाई पतंजलि ने आगे की तस्वीर

पंतनगर में हुए इस कार्यक्रम ने ‘आदिग्राम’ के अगले चरण की संभावनाओं को भी सामने रखा। कृषि विश्वविद्यालय और पतंजलि के बीच कृषि, प्राकृतिक खेती, औषधीय पौधों, किसानों के प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। यहीं ‘आदिग्राम’ की डिजिटल कहानी और कृषि की कहानी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है क्योंकि यदि किसी क्षेत्र के किसान और परिवार डिजिटल रूप से पहचाने जा चुके हैं । उनकी जरूरतों का डेटा उपलब्ध है और उनकी भौगोलिक स्थिति भी दर्ज है तो भविष्य में उन्हें उनकी जरूरत के मुताबिक तकनीक, प्रशिक्षण, बीज, कृषि सलाह और बाजार से जोड़ना कहीं अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता है।








