पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार V. Anantha Nageswaran ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी केवल अस्थायी झटका नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक स्थिति और विदेशी मुद्रा संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
उद्योग संगठन सीआईआई के वार्षिक बिजनेस सम्मेलन में बोलते हुए नागेश्वरन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। उनका कहना था कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर लंबे समय तक रह सकता है और इससे भारत के आर्थिक संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल, महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार की वित्तीय योजनाओं और विकास दर पर असर पड़ सकता है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने इस स्थिति को भारत के लिए “बैलेंस ऑफ पेमेंट्स स्ट्रेस टेस्ट” बताया। इसका अर्थ यह है कि बढ़ती ऊर्जा कीमतें देश के विदेशी मुद्रा प्रबंधन और व्यापार संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। भारत पहले से ही वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, कमजोर मांग और महंगाई जैसे मुद्दों का सामना कर रहा है। ऐसे में तेल की बढ़ती कीमतें अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो पेट्रोल और डीजल की घरेलू कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। इससे परिवहन लागत बढ़ेगी और खाद्य पदार्थों सहित कई जरूरी वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। महंगाई बढ़ने की स्थिति में आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ना तय माना जा रहा है।
व्यापार जगत के कई बड़े नाम भी मौजूदा वैश्विक हालात को लेकर चिंता जता चुके हैं। उद्योग जगत का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर निवेश, व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को इस चुनौती से निपटने के लिए ऊर्जा आयात के वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना होगा। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर तेल पर निर्भरता कम करने की जरूरत बताई जा रही है। सरकार पहले से ही सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने पर जोर दे रही है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक बाजार की स्थिति भारत की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है, तो सरकार को वित्तीय नीतियों और खर्च की प्राथमिकताओं में बदलाव करना पड़ सकता है।








