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Aravalli Crisis: खत्म हो रही हैं अरावली की पहाड़ियां, उत्तर भारत पर मंडरा रहा रेगिस्तान का खतरा

-अरावली में 12 बड़ी दरारें, बढ़ रहा मरुस्थलीकरण: दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के लिए खतरे की घंटी

-अवैध खनन ने तोड़ी भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली, भूजल और पर्यावरण पर गहरा संकट

-वर्ष 2018-19 के दौरान राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 62% और हरियाणा के लगभग 8% क्षेत्र में मरुस्थलीकरण हुआ

नई दिल्ली/चंडीगढ़/हरिद्वार/देहरादून: करीब 2 अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश के लगभग 700 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। पिछले लगभग 50 वर्षों से वैध और अवैध खनन, पहाड़ों में विस्फोट, अंधाधुंध कटाई, रियल एस्टेट परियोजनाओं और निर्माण कार्यों ने इस प्राचीन पर्वतमाला को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है। पिछले कुछ दशकों में अरावली के दोहन से थार मरुस्थल की धूल अब पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक पहुँच रही है, जिससे वायु प्रदूषण और धूल भरी आँधियों की तीव्रता लगातार बढ़ रही है और यह लोगों के जीवन के पर गहरा संकट लेकर भविष्य में आयेगी।

अरावली विरासत जन अभियान जो पर्यावरणविदों, पारिस्थितिकी विशेषज्ञों, सामुदायिक नेताओं, नागरिक समाज समूहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं, वकीलों और अरावली क्षेत्र के राज्यों व देश भर में रहने वाले ग्रामीण और शहरी लोगों के एक बड़े गठबंधन की सह-संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने कहा, “पिछले कुछ दशकों में अरावली का विनाश इतनी तेज़ी से हुआ है कि दक्षिण राजस्थान के अजमेर से लेकर उत्तर राजस्थान के झुंझुनू और दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक अरावली में 12 से अधिक बड़े अवरोध (ब्रीच) बन चुके हैं। इसके कारण थार मरुस्थल की धूल अब पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक पहुँच रही है, जिससे वायु प्रदूषण और धूल भरी आँधियों की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि डेजर्टिफिकेशन एंड लैंड डिग्रेडेशन एटलस 2021 के अनुसार, वर्ष 2018-19 के दौरान राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 62 प्रतिशत और हरियाणा के लगभग 3.6 लाख हेक्टेयर (8 प्रतिशत) क्षेत्र में मरुस्थलीकरण हुआ। इसका मुख्य कारण पवन अपरदन और वनस्पति का क्षरण है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति ने पाया था कि राजस्थान के अलवर जिले में खनन के कारण अरावली की 31 पहाड़ियाँ पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। यह केवल एक जिले में अध्ययन की गई पहाड़ियों का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा था। इसी प्रकार, दक्षिण हरियाणा के चरखी दादरी और भिवानी जिलों में पिछले दस वर्षों में हुए वैध खनन ने भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला को लगभग समाप्त कर दिया है। ये पहाड़ियाँ हमेशा के लिए नष्ट हो चुकी हैं और कोई भी तकनीक इन्हें वापस नहीं ला सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली का यह विनाश सीधे तौर पर मरुस्थलीकरण से जुड़ा हुआ है। खनन के कारण वनस्पति नष्ट होती है, जिससे मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ता है और उत्तर-पश्चिम भारत की खाद्य और जल सुरक्षा गंभीर संकट में पड़ जाती है।“
कैलाश मीणा, जो पिछले तीन दशकों से उत्तर राजस्थान के खनन प्रभावित समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं ने कहा, ‘उत्तर-पश्चिम भारत की जल सुरक्षा अरावली के स्वस्थ रहने पर निर्भर करती है। अरावली दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण जल पुनर्भरण (रीचार्ज) क्षेत्र है। उन्होंने बताया कि अरावली की प्राकृतिक दरारें और चट्टानी संरचनाएँ प्रति हेक्टेयर हर वर्ष लगभग 20 लाख लीटर पानी भूमि में पहुँचाने की क्षमता रखती हैं। लेकिन खनन, पहाड़ों में विस्फोट, रियल एस्टेट परियोजनाएँ, जहरीले कचरे का निस्तारण और परित्यक्त खदानों में अंधाधुंध कचरा फेंकने से भूजल स्तर और उसकी गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं। लगातार विस्फोट और ड्रिलिंग से जलभृत (एक्विफर) क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। अरावली क्षेत्र के कई हिस्सों में भूजल स्तर 1000 से 2000 फीट तक नीचे चला गया है, जिससे पीने और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बुरी तरह प्रभावित हुई है। खनन में इस्तेमाल होने वाले रसायन भूजल और सतही जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे जलजनित बीमारियाँ फैल रही हैं और मनुष्यों, पशुओं तथा वन्यजीवों की मृत्यु तक हो रही है। अरावली से निकलने वाली अनेक नदियाँ और जलधाराएँ या तो सूख चुकी हैं या गंभीर रूप से प्रदूषित हो गई हैं। अधिकांश स्टोन क्रशर लगातार चलने के कारण हवा में सिलिका धूल फैला रहे हैं, जिससे अनेक श्वसन संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। खनन ने केवल पहाड़ों को ही नहीं, बल्कि पशुओं के चरागाहों को भी नष्ट कर दिया है। जिन गाँवों में बड़े पैमाने पर खनन हुआ है, वहाँ पशुधन की संख्या में भारी गिरावट आई है और लोगों की पारंपरिक आजीविकाएँ प्रभावित हुई हैं। पानी की कमी और फसलों पर धूल की मोटी परत जमने के कारण कृषि उत्पादन भी घटा है। मानव बस्तियों के पास खनन होने वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग अस्थमा, तपेदिक (टीबी), सिलिकोसिस तथा त्वचा, यकृत, फेफड़े और गुर्दों से संबंधित गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे हैं।‘
हरियाणा के जलवायु कार्यकर्ता लोकेश भिवानी ने कहा, ‘माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 25 मई 2026 के अपने आदेश के माध्यम से अरावली की विवादित 100 मीटर परिभाषा की समीक्षा के लिए एक नई समिति का गठन किया है। उन्होंने कहा कि चूँकि नई समिति को अक्टूबर 2025 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट का मूल्यांकन करना है, इसलिए उसी मंत्रालय के अधीन रहकर निष्पक्ष और स्वतंत्र समीक्षा संभव नहीं है। उन्होंने माँग की कि सुप्रीम कोर्ट अपने 25 मई 2026 के आदेश में संशोधन करे ताकि नई समिति के अध्यक्ष और सदस्य सचिव पर्यावरण मंत्रालय या उसके अधीन किसी संस्था से जुड़े कार्यरत अधिकारी न हों। उनकी जगह अरावली क्षेत्र का गहन ज्ञान रखने वाले स्वतंत्र पर्यावरणविद्, पारिस्थितिकी विशेषज्ञ या वैज्ञानिक को अध्यक्ष बनाया जाए। साथ ही स्वास्थ्य, आजीविका, कृषि, पशुपालन, पारिस्थितिकी, वन्यजीव और जल विज्ञान के विशेषज्ञों को समिति का स्थायी सदस्य बनाया जाए, ताकि खनन के प्रभावों का समग्र अध्ययन किया जा सके। उन्होंने यह भी माँग की कि समिति अपनी रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को सौंपे, न कि किसी मंत्रालय या विभाग के माध्यम से।‘
दक्षिण राजस्थान की भील आदिवासी नेता साधना मीणा ने कहा, ‘नई समिति को केवल ईमेल या डाक से सुझाव लेने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के खनन प्रभावित गाँवों का दौरा करना चाहिए और स्थानीय समुदायों के साथ प्रत्यक्ष संवाद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि 31 अगस्त 2026 तक व्यापक और तथ्यपूर्ण रिपोर्ट तैयार करना संभव नहीं होगा, इसलिए रिपोर्ट जमा करने की समयसीमा बढ़ाई जानी चाहिए।‘
दुर्गा शंकर, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रतापगढ़ (राजस्थान) ने कहा, ‘पूरी अरावली पर्वतमाला पर पिछले 50 वर्षों में हुए खनन, स्टोन क्रशिंग, रियल एस्टेट परियोजनाओं, अतिक्रमण, कचरा निस्तारण और जलाने जैसी गतिविधियों के सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र और समग्र अध्ययन कराया जाना चाहिए। यह अध्ययन राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों तथा जल विज्ञान, पारिस्थितिकी, वन्यजीव, पर्यावरण विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और व्यावसायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सहायता से किया जाना चाहिए। गोवा, कर्नाटक और ओडिशा के संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में खनन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया था। साथ ही, ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ के तहत खनन कंपनियों और जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।‘
जोधपुरा संघर्ष समिति के सचिव कैलाश यादव ने कहा, ‘नई समिति को जल-संकट वाले क्षेत्रों में खनन और डस्ट वॉशिंग प्लांट जैसी अत्यधिक जल खपत वाली गतिविधियों की अनुमति देने वाले नियमों की समीक्षा करनी चाहिए। वर्तमान पर्यावरण स्वीकृतियों में मौजूद यह प्रावधान कि ‘भूजल स्तर को प्रभावित किए बिना खनन किया जाए, और यदि आवश्यक हो तो केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की अनुमति ली जाए’-इसका परिणाम यह हुआ है कि पूरे अरावली क्षेत्र में भूजल खतरनाक स्तर तक नीचे चला गया है और ग्रामीण समुदाय पीने और सिंचाई के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में संचालित अधिकांश लाइसेंस प्राप्त खदानें नियमों का उल्लंघन कर रही हैं। ऐसी सभी अवैध गतिविधियों को तत्काल बंद किया जाना चाहिए और नुकसान की भरपाई ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ के अनुसार कराई जानी चाहिए।‘
गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ता अशोक चौधरी ने कहा, ‘नागरिक अरावली की प्रस्तावित एकरूप परिभाषा को पूरी तरह समाप्त करने की माँग करते हैं। अरावली को कमजोर कानूनी परिभाषाओं और तथाकथित ‘सतत खनन योजनाओं’ की नहीं, बल्कि कठोर संरक्षण की आवश्यकता है। खनन कभी भी सतत गतिविधि नहीं हो सकती क्योंकि इसकी सामाजिक, पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी लागत बहुत अधिक होती है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि सरकार को वैकल्पिक निर्माण सामग्री को बढ़ावा देने का निर्देश दिया जाए ताकि हरियाणा, राजस्थान और गुजरात की अरावली पहाड़ियों से पत्थर निकालना बंद हो सके। उन्होंने कहा कि अरावली के शेष बचे पूरे 700 किलोमीटर क्षेत्र को उसकी पारिस्थितिक महत्ता को देखते हुए ‘अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र” घोषित किया जाना चाहिए, ताकि उत्तर-पश्चिम भारत के करोड़ों लोगों की जल, जलवायु और जैव विविधता सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की रक्षा हो सके।

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