हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के पांवटा साहिब वन क्षेत्र में रॉयल बंगाल टाइगर की मौजूदगी ने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में लगाए गए कैमरा ट्रैप में इस दुर्लभ और शक्तिशाली वन्यजीव की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड होने के बाद पूरे क्षेत्र में सतर्कता बढ़ा दी गई है। अधिकारियों का मानना है कि यह वही बाघ हो सकता है, जिसकी गतिविधियां पिछले लगभग एक वर्ष से उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व में दर्ज नहीं हुई थीं।
वन विभाग के अनुसार, पांवटा साहिब के खारा ब्लॉक में लगे कैमरा ट्रैप में सोमवार को बाघ की स्पष्ट तस्वीरें कैद हुईं। इसके अलावा आसपास के जंगलों में मिले पंजों के निशान और पेड़ों पर खरोंच के ताजा निशान इस बात की पुष्टि करते हैं कि बाघ पिछले दो से तीन दिनों से इस इलाके में सक्रिय है।
विशेषज्ञों का कहना है कि खारा क्षेत्र और उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व के बीच लगभग 80 किलोमीटर की दूरी है। ऐसे में वन्यजीव गलियारों (वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर) के माध्यम से बाघ का एक राज्य से दूसरे राज्य में पहुंचना असंभव नहीं है। यही वजह है कि हिमाचल और उत्तराखंड के वन विभाग संयुक्त रूप से इस मामले की निगरानी कर रहे हैं।
फिलहाल बाघ के लिंग की पहचान नहीं हो पाई है। वन अधिकारियों ने क्षेत्र में अतिरिक्त कैमरा ट्रैप लगाने का निर्णय लिया है, ताकि उसकी गतिविधियों और आवागमन के रास्तों पर लगातार नजर रखी जा सके। साथ ही राजाजी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों को भी इसकी सूचना दे दी गई है और उनकी टीम जल्द ही मौके का निरीक्षण कर सकती है।
वन विभाग ने सुरक्षा के मद्देनजर क्षेत्र में घूमने वाले गद्दी समुदाय के चरवाहों और स्थानीय ग्रामीणों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। लोगों से अपील की गई है कि वे जंगल के अंदर अकेले न जाएं और किसी भी वन्यजीव की गतिविधि दिखाई देने पर तुरंत विभाग को सूचना दें।
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स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने पहले भी कई बार इस क्षेत्र में बाघ जैसे बड़े जानवर को देखा था, लेकिन उस समय उसके अस्तित्व का कोई ठोस डिजिटल प्रमाण नहीं था। अब कैमरा ट्रैप में तस्वीरें आने के बाद इन दावों को बल मिला है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना हिमाचल प्रदेश के जंगलों की जैव विविधता और प्राकृतिक आवास की समृद्धि को दर्शाती है। यदि बाघ ने यहां स्थायी रूप से अपना क्षेत्र बनाना शुरू किया है, तो यह राज्य के वन संरक्षण प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भी मानी जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले ही कुल्लू जिले के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लगभग छह वर्षों बाद हिम तेंदुए की तस्वीर भी कैमरा ट्रैप में कैद हुई थी। ऐसे में हिमाचल प्रदेश के जंगल एक बार फिर दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण चर्चा में हैं।







