-ऋतुचर्या का बदलता चक्र: दो दशक पहले सुहावना दिखने वाला अक्टूबर अब क्यों बन रहा है आफत का महीना ?
-मानसून और पश्चिमी विक्षोभ का घातक ‘ओवरलैप’, डेढ़ दशक में कैसे बदला बादलों के बरसने का पूरा गणित?
-अन्नदाताओं की बर्बादी से रसोई तक मार, क्या बेमौसम ओलावृष्टि इस बार देश में महंगाई को दावत?
नवीन पाण्डेय, नई दिल्ली/देहरादून: भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम का चक्र अब इस कदर बदल चुका है कि पारंपरिक ऋतुचर्या के मायने ही बदल गए हैं। विशेष तौर पर हिमालयी राज्य उत्तराखंड में मानसून की विदाई और उसके तुरंत बाद सक्रिय होने वाले मौसमी तंत्रों ने कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। हाल ही में अक्टूबर के शुरुआती दिनों में यानी शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान राज्य के कई हिस्सों में हुई मूसलाधार बेमौसम बारिश और भीषण ओलावृष्टि ने इस बदलाव को एक बार फिर रेखांकित किया है। इस विश्लेषण रिपोर्ट में हमने यह टटोलने की कोशिश की है कि आखिर मौसम का यह मिजाज किस हद तक बदल चुका है और इसके दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक व कृषिगत दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं?
गौर करें तो बीस साल पहले यानि दो दशक पहले तक अक्टूबर के इस दौर में फसलें पूरी तरह सुरक्षित होती थीं। तब इस तरह के अचानक और आक्रामक मौसमी प्रहार से बड़े पैमाने पर फसलें नष्ट होने के उदाहरण बेहद दुर्लभ हुआ करते थे, जिससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलती थी। दो दशक पहले मानसून आमतौर पर सितंबर के दूसरे पखवाड़े तक पूरी तरह विदा हो जाता था और सितंबर के अंतिम दिनों से लेकर अक्टूबर की शुरुआत तक मौसम पूरी तरह साफ, शुष्क व सुहाना रहता था। इसके विपरीत, हाल के वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडलीय बदलावों के चलते मानसून की वापसी का यह चक्र सितंबर के अंत से लेकर अक्टूबर के पहले सप्ताह तक खिंचने लगा है। यह एक गंभीर संकेत है क्योंकि आज से 15-20 साल पहले अक्टूबर के शुरुआती दिनों में ऐसी आक्रामक ओलावृष्टि और चक्रवातीय बारिश का चलन लगभग न के बराबर था। उस समय अक्टूबर की शुरुआत हल्की ठंड और शुष्क मौसम की दस्तक होती थी।
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नवरात्रि और अक्टूबर में ओलावृष्टि
अक्टूबर के पहले सप्ताह में पड़ने वाले शारदीय नवरात्रि के दौरान हाल के वर्षों में अचानक जिस तरह से मूसलाधार बारिश और भयंकर ओले गिरने की घटनाएं बढ़ी हैं, उसने किसानों और मौसम वैज्ञानिकों दोनों को चिंता में डाल दिया है।
डेढ़ दशक में प्रदेश से मानसून की विदाई के बदलते समीकरण
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों पर नजर डाले तो उत्तराखंड से दक्षिण-पश्चिम मानसून की सामान्य विदाई की तिथि 25 से 30 सितंबर के आसपास निर्धारित है। हालांकि, पिछले पंद्रह वर्षों (2011–2025) के आंकड़ों का गहन विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि मानसून का लौटना अब अधिक विलंबित, अनिश्चित और अनियमित हो गया है।
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