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मध्य पूर्व संकट में भारत की संतुलित कूटनीति, रणनीतिक स्वायत्तता बनी सबसे बड़ी ताकत

मध्य पूर्व में कई महीनों तक चले तनाव, समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच टकराव के दौरान भारत ने जिस संतुलित कूटनीति का परिचय दिया, वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का विषय बन गई है। एक ओर भारत ने अपने नागरिकों और आर्थिक हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी, वहीं दूसरी ओर किसी भी पक्ष के साथ खुलकर खड़े होने के बजाय संवाद और कूटनीतिक समाधान पर जोर बनाए रखा।

विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया संकट ने भारत की विदेश नीति की उस सोच को उजागर किया है, जिसमें राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च रखते हुए विभिन्न देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने की रणनीति अपनाई जाती है। यही कारण है कि संकट के दौरान भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की।

मध्य पूर्व भारत के लिए केवल एक रणनीतिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और वहां से आने वाली धनराशि भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसके अलावा भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से पूरा होता है।

तनाव के दौरान समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे ने भारत की चिंताओं को बढ़ा दिया था। विशेष रूप से तेल और गैस आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका ने सरकार और उद्योग जगत को सतर्क कर दिया। हालांकि भारत ने स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखी और अपने कूटनीतिक संपर्कों के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि आपूर्ति श्रृंखला पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।

विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने एक साथ कई महत्वपूर्ण देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखा। भारत के इजराइल, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और अमेरिका जैसे देशों के साथ अलग-अलग रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष का समर्थन करना भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता था।

यही कारण है कि भारत ने संकट के दौरान संवाद की नीति को प्राथमिकता दी। विभिन्न देशों के नेताओं और अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा गया। कूटनीतिक स्तर पर यह संदेश दिया गया कि भारत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने का समर्थक है।

इस संकट ने भारत को वैकल्पिक व्यापार और परिवहन मार्गों के महत्व का भी एहसास कराया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे संकटों से बचने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं और नए व्यापार गलियारों पर अधिक ध्यान दे सकता है। इससे न केवल व्यापार को मजबूती मिलेगी बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता के जोखिम भी कम होंगे।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। अब भारत पारंपरिक गुटबंदी से दूर रहते हुए व्यावहारिक और हित-आधारित संबंधों पर जोर देता है। यही वजह है कि अलग-अलग विचारधाराओं और हितों वाले देशों के साथ भी भारत सकारात्मक संवाद बनाए रखने में सफल रहा है।

हालिया संकट के बाद भारत की भूमिका को एक ऐसे देश के रूप में देखा जा रहा है जो विभिन्न पक्षों के बीच संवाद का पुल बन सकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और कूटनीतिक विश्वसनीयता का संकेत है।

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