नशे और नार्को नेटवर्क के खिलाफ सख्त अभियान की तैयारी, सीमा सुरक्षा और एजेंसियों की भूमिका होगी अहम

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देश में वामपंथी उग्रवाद के कमजोर पड़ने के बाद अब केंद्र सरकार की नजर नशे के कारोबार और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में सुरक्षा एजेंसियों और केंद्रीय जांच संस्थानों की गतिविधियों से संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले वर्षों में ड्रग तस्करी, नार्को फंडिंग और संगठित अपराध के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया जा सकता है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की भौगोलिक स्थिति उसे वैश्विक ड्रग नेटवर्क के बीच एक संवेदनशील क्षेत्र बनाती है। देश एक तरफ अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र से जुड़े अवैध हेरोइन नेटवर्क के करीब है, तो दूसरी ओर दक्षिण-पूर्व एशिया के सिंथेटिक ड्रग तस्करी मार्गों का भी असर भारत तक पहुंचता है। समुद्री सीमाओं और लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के कारण तस्कर नए-नए रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

हाल ही में कई राज्यों में बड़ी मात्रा में मादक पदार्थों की जब्ती ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है। जांच एजेंसियों का कहना है कि ड्रग तस्करी अब केवल अपराध का मामला नहीं रह गया, बल्कि इसका संबंध संगठित अपराध, हवाला नेटवर्क और कुछ मामलों में आतंक वित्तपोषण से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, पहले भारत को केवल ट्रांजिट रूट के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब देश में ड्रग्स की खपत भी बढ़ी है। तेजी से बदलती जीवनशैली, ऑनलाइन नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों ने सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों की उपलब्धता बढ़ा दी है। युवाओं को निशाना बनाकर चलाए जा रहे अवैध नेटवर्क सामाजिक और सुरक्षा दोनों स्तरों पर चुनौती बनते जा रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि ड्रग्स का पैसा कई बार संगठित अपराध और आतंकी गतिविधियों तक पहुंचता है। इसी कारण नार्को नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा जा रहा है। जांच एजेंसियां वित्तीय लेनदेन, अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और डिजिटल नेटवर्क की भी निगरानी बढ़ा रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रग तस्करी को रोकने के लिए केवल सीमाओं पर निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, साझा खुफिया जानकारी और मजबूत कानूनी ढांचे की जरूरत होगी। कई देशों में नशीले पदार्थों को लेकर अलग-अलग कानून और नीतियां होने के कारण तस्कर कानूनी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।

भारत में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, सीमा सुरक्षा बल, तटरक्षक बल और अन्य एजेंसियां लगातार संयुक्त अभियान चला रही हैं। समुद्री मार्गों, कंटेनर पोर्ट, ड्रोन गतिविधियों और ऑनलाइन भुगतान नेटवर्क पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि ड्रग्स की तस्करी में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से चुनौती और जटिल हो गई है।

समाजशास्त्रियों का कहना है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों के भरोसे नहीं जीती जा सकती। इसके लिए जागरूकता अभियान, युवाओं में शिक्षा और पुनर्वास सुविधाओं को भी मजबूत करना जरूरी है। कई राज्यों में स्कूलों और कॉलेजों में एंटी-ड्रग अभियान चलाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रग कारोबार से जुड़ा अवैध पैसा देश की आर्थिक व्यवस्था को भी प्रभावित करता है। हवाला नेटवर्क और अवैध फंडिंग के जरिए यह पैसा कई अन्य आपराधिक गतिविधियों तक पहुंच सकता है।

फिलहाल केंद्र और सुरक्षा एजेंसियां नशे के कारोबार के खिलाफ रणनीति को और मजबूत करने में जुटी हैं। आने वाले समय में सीमा सुरक्षा, साइबर निगरानी और वित्तीय जांच से जुड़े कदम और तेज किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

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