BJP में नई टीम के बाद अब संसदीय बोर्ड पर नजर, नितिन नबीन के सामने बड़े फैसले की चुनौती

भारतीय जनता पार्टी (BJP) में राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन की टीम के आकार लेने के बाद अब पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले निकायों में से एक संसदीय बोर्ड (Parliamentary Board) को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि नितिन नबीन जल्द ही संसदीय बोर्ड के साथ-साथ केंद्रीय चुनाव समिति, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं।

संसदीय बोर्ड पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बेहद अहम भूमिका निभाता है। पार्टी के संविधान के अनुसार यह बोर्ड प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए नामों की सिफारिश करने, गठबंधन से जुड़े बड़े फैसले लेने, नीतिगत निर्णयों पर विचार करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई जैसे मामलों में भूमिका निभाता है। इसके सदस्य केंद्रीय चुनाव समिति का भी हिस्सा होते हैं, जो चुनावों में उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को अंतिम रूप देती है।

नितिन नबीन के सामने बोर्ड के पुनर्गठन की चुनौती

बीजेपी के संविधान के अनुसार संसदीय बोर्ड में अधिकतम 11 सदस्य हो सकते हैं, जिसमें पार्टी अध्यक्ष भी शामिल होता है। हालांकि वर्तमान बोर्ड में 12 सदस्य बताए जा रहे हैं। अब नितिन नबीन के सामने यह तय करने की चुनौती होगी कि नए बोर्ड में किन वरिष्ठ नेताओं को जगह दी जाए और किन नेताओं को बाहर रखा जाए।

पार्टी अध्यक्ष संसदीय बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होते हैं, जबकि एक राष्ट्रीय महासचिव को इसका सचिव बनाया जाता है। आम तौर पर बोर्ड में पार्टी के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं को शामिल किया जाता है। इसके साथ ही क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखा जाता है।

मौजूदा बोर्ड में कौन-कौन हैं?

मौजूदा संसदीय बोर्ड में नितिन नबीन के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पूर्व पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. के. लक्ष्मण, इकबाल सिंह लालपुरा, डॉ. सुधा यादव और डॉ. सत्यनारायण जटिया जैसे नेता शामिल हैं।

बीएल संतोष को संसदीय बोर्ड का सचिव बनाया गया है।

बोर्ड में कई बड़े नेताओं को जगह नहीं मिलने को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठे हैं। हालांकि बीजेपी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बोर्ड बनाते समय वरिष्ठता के साथ-साथ सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का भी ध्यान रखा गया है। पार्टी का दावा है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदायों को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है।

क्या मुख्यमंत्री को संसदीय बोर्ड में जगह मिलेगी?

नए संसदीय बोर्ड के गठन में सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लेकर हो सकती है। पार्टी में पहले कुछ समय तक यह परंपरा रही है कि बीजेपी शासित राज्य का कोई मुख्यमंत्री संसदीय बोर्ड का सदस्य बन सकता है। हालांकि इस व्यवस्था को लेकर पहले भी राजनीतिक और संगठनात्मक बहस होती रही है।

सवाल यह है कि बीजेपी के मौजूदा 17 मुख्यमंत्रियों में से किन नेताओं को संसदीय बोर्ड में जगह दी जाएगी।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस फिलहाल केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य हैं, लेकिन संसदीय बोर्ड में शामिल नहीं हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जैसे वरिष्ठ मुख्यमंत्रियों के नाम भी संभावित दावेदारों में चर्चा में रह सकते हैं।

मोदी से लेकर शिवराज तक, पहले भी हुआ है बदलाव

संसदीय बोर्ड में मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी का मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2006 में राजनाथ सिंह के बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से हटा दिया गया था। मोदी इससे पहले लालकृष्ण आडवाणी के पार्टी अध्यक्ष रहते हुए बोर्ड में शामिल हुए थे।

बाद में 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद उन्हें फिर संसदीय बोर्ड में जगह मिली। उसी दौरान मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी बोर्ड में शामिल किया गया था।

इसके बाद 2022 में जेपी नड्डा के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद संसदीय बोर्ड में बड़ा बदलाव हुआ। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को बोर्ड से बाहर कर दिया गया था।

मुख्यमंत्री को बोर्ड में रखने पर क्यों उठता है सवाल?

संसदीय बोर्ड में किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को शामिल करने के खिलाफ एक तर्क यह दिया जाता है कि यही बोर्ड मुख्यमंत्री के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में किसी मौजूदा मुख्यमंत्री का उस निकाय का सदस्य होना हितों के टकराव से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है।

अब नए बोर्ड के गठन के समय यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस पुराने तर्क को प्राथमिकता देती है या वरिष्ठ मुख्यमंत्रियों को संगठन के सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय में प्रतिनिधित्व देती है।

जेपी नड्डा और नितिन गडकरी पर भी नजर

नए संसदीय बोर्ड में दो पूर्व बीजेपी अध्यक्षों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। पार्टी अध्यक्ष रहते हुए जेपी नड्डा संसदीय बोर्ड के सदस्य रहे हैं। अब नितिन नबीन को यह तय करना होगा कि पूर्व अध्यक्ष के तौर पर नड्डा को बोर्ड में बनाए रखा जाए या नहीं।

यदि नड्डा को जगह मिलती है तो इसी आधार पर एक और सवाल उठ सकता है कि पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी को भी बोर्ड में बनाए रखा जाए या नहीं।

इस तरह नए संसदीय बोर्ड का गठन सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं होगा, बल्कि इसमें वरिष्ठता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक संतुलन और पार्टी के भविष्य के राजनीतिक समीकरणों का भी असर दिखाई दे सकता है।

आगे क्या होगा?

नितिन नबीन के सामने अब पार्टी के प्रमुख संगठनात्मक निकायों को नए सिरे से आकार देने की प्रक्रिया है। संसदीय बोर्ड के अलावा केंद्रीय चुनाव समिति, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद के गठन पर भी पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर रहेगी।

Leave a Comment

और पढ़ें

🔮 आज का राशिफल