जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में पोस्टग्रेजुएट यानी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले को लेकर चल रहे विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को ‘डेप्रिवेशन पॉइंट्स’ (Deprivation Points) के प्रावधान के तहत दाखिला प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी है। हालांकि, इन प्रावधानों के आधार पर होने वाले सभी दाखिले संबंधित याचिका के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।
दिल्ली हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने एकल पीठ के उस आदेश में बदलाव किया, जिसके तहत JNU की पोस्टग्रेजुएट एडमिशन प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लग गई थी।
क्या है डेप्रिवेशन पॉइंट्स का विवाद?
JNU में कुछ विशेष भौगोलिक क्षेत्रों और अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों से आने वाले अभ्यर्थियों को अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं। इन्हें डेप्रिवेशन पॉइंट्स कहा जाता है। विश्वविद्यालय का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्रों की बेहतर भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
हालांकि, अभ्यर्थी अमित मेहरा ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ के समक्ष याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि डेप्रिवेशन पॉइंट्स के कारण CUET में उम्मीदवारों द्वारा हासिल किए गए वास्तविक अंकों का महत्व काफी कम हो जाता है।
14 अगस्त को लग गई थी एडमिशन पर रोक
इस मामले में 14 अगस्त को एकल पीठ ने JNU की पोस्टग्रेजुएट एडमिशन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी थी। आदेश के मुताबिक 24 अगस्त तक दाखिले को अंतिम रूप देने या इस संबंध में आगे कोई कदम उठाने पर रोक थी।
JNU ने इस आदेश के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का रुख किया। विश्वविद्यालय की ओर से दलील दी गई कि एकल पीठ के आदेश के कारण पूरी एडमिशन प्रक्रिया रुक गई है और इसका असर उन छात्रों पर भी पड़ रहा है, जिन्होंने पहले ही काउंसलिंग के आधार पर दाखिला ले लिया है।
हाईकोर्ट ने क्यों हटाई रोक?
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि JNU में डेप्रिवेशन पॉइंट्स देने की व्यवस्था 1974 से चली आ रही है। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए ई-प्रॉस्पेक्टस 3 अप्रैल को जारी किया गया था, जबकि एडमिशन प्रक्रिया 25 मई से शुरू हो चुकी थी।
कोर्ट के मुताबिक, पहले राउंड की काउंसलिंग के आधार पर दाखिला लेने वाले पोस्टग्रेजुएट छात्रों की कक्षाएं भी 30 जुलाई से शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में एडमिशन प्रक्रिया को पूरी तरह रोक देना उचित नहीं माना गया।
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि यदि डेप्रिवेशन पॉइंट्स की व्यवस्था को लेकर कोई प्रथमदृष्टया निष्कर्ष नहीं निकला है कि यह व्यवस्था अवैध है, तो पूरी एडमिशन प्रक्रिया को कैसे रोका जा सकता है।
कोर्ट ने JNU को क्या निर्देश दिया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में JNU को निर्देश दिया कि वह शैक्षणिक सत्र 2026-27 के ई-प्रॉस्पेक्टस में दिए गए नियमों के अनुसार एडमिशन प्रक्रिया आगे बढ़ाए। इसमें वे प्रावधान भी शामिल हैं जिन्हें एकल पीठ के सामने चुनौती दी गई है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डेप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर होने वाले सभी दाखिले अंतिम न्यायिक फैसले के अधीन रहेंगे।
अदालत ने एकल पीठ से भी अनुरोध किया कि वह इस मामले की सुनवाई यथासंभव जल्द पूरी करे, ताकि छात्रों और विश्वविद्यालय के सामने स्थिति जल्द स्पष्ट हो सके।
JNU ने क्या कहा?
JNU की ओर से अदालत में कहा गया कि विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों से छात्रों और शिक्षकों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। विश्वविद्यालय के अनुसार, डेप्रिवेशन पॉइंट्स की व्यवस्था इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई थी।
वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से इस व्यवस्था का विरोध जारी है। अब इस मामले में अंतिम निर्णय एकल पीठ द्वारा याचिका की सुनवाई पूरी करने के बाद लिया जाएगा।
छात्रों के लिए क्या मायने रखता है?
हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद JNU में पोस्टग्रेजुएट एडमिशन प्रक्रिया फिलहाल जारी रह सकेगी। हालांकि, डेप्रिवेशन पॉइंट्स से संबंधित नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर आने वाला अंतिम फैसला दाखिलों की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।








