पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का सवाल—बिना जनसुनवाई और गांवों तक पहुंचे कैसे सौंप दी जाएगी रिपोर्ट?
हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट सौंपने की समय-सीमा बढ़ाने की मांग
विशेषज्ञों की अपील—ग्राउंड लेवल तक पहुंचे कमेटी, तभी सामने आएगी अरावली की असल तस्वीर

हरिद्वार/नई दिल्ली। अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण और उससे जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर गठित सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी को 31 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। हालांकि, देशभर के पर्यावरण विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, किसानों, आदिवासी प्रतिनिधियों और राजनेताओं ने कमेटी को पत्र लिखकर रिपोर्ट सौंपने की समय-सीमा बढ़ाने की मांग की है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत आने वाले राज्यों और जिलों के कई महत्वपूर्ण इलाकों तक हाई पावर कमेटी अब तक पहुंच ही नहीं पाई है। ऐसे में इस क्षेत्र से सीधे जुड़े ग्रामीणों, किसानों, आदिवासी समुदायों और खनन से प्रभावित लोगों के साथ पर्याप्त संवाद भी नहीं हो पाया है। कई इलाकों में अभी तक जनसुनवाई तक नहीं हुई है। विशेषज्ञों का तर्क है कि ऐसी स्थिति में जल्दबाजी में रिपोर्ट सौंपना जमीनी हकीकत के साथ न्याय नहीं होगा।
ग्रामीण समुदायों की आजीविका पर पड़ा गहरा असर
1936 में बने भारत के प्रमुख किसान संगठन ऑल इंडिया किसान सभा के उपाध्यक्ष इंदरजीत सिंह ने कहा कि सदियों से करीब 700 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वत श्रृंखला के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदाय छोटे पैमाने पर खेती और पशुपालन के जरिए अपनी आजीविका चलाते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले पांच दशकों में अरावली क्षेत्र में इन पारंपरिक गतिविधियों पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है। अत्यधिक खनन के कारण जल संकट बढ़ा है, जबकि स्टोन क्रशर से निकलने वाली धूल की मोटी परत खेतों और फसलों पर जम रही है। खनन के लिए पहाड़ियों को समतल करने और माइनिंग वेस्ट को जगह-जगह डंप किए जाने से चरागाह भी लगातार खत्म हुए हैं।
इंदरजीत सिंह के मुताबिक, इसके बावजूद अरावली कमेटी ने अब तक प्रभावित इलाकों में से किसी का भी पर्याप्त दौरा नहीं किया है। चाहे वे गुजरात, राजस्थान या हरियाणा के इलाके हों, वहां रहने वाले प्रभावित लोगों की जमीनी समस्याओं को समझने के लिए व्यापक फील्ड विजिट की जरूरत है।
गुजरात के प्रभावित समुदायों की भी चिंता

गुजरात के रहने वाले अशोक चौधरी, जो ‘आदिवासी समन्वय मंच भारत’ के संस्थापक हैं, और अशोक श्रीमाली, जो ‘माइन्स, मिनरल्स एंड पीपल’ के फाउंडर हैं और माइनिंग से प्रभावित ग्रामीण समुदायों के साथ काम करते हैं, ने अरावली कमेटी को पत्र लिखा है।
दोनों ने अपने पत्र के माध्यम से गुजरात के प्रभावित लोगों की गहरी निराशा जाहिर की और कमेटी से मांग की कि वह राज्य के उन क्षेत्रों तक पहुंचे जहां खनन और उससे जुड़ी गतिविधियों का स्थानीय पर्यावरण और लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है।
डॉ. रवि चोपड़ा ने अपने अनुभव का दिया हवाला
उत्तराखंड के पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. रवि चोपड़ा ने अरावली कमेटी को भेजे ईमेल में कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई हाई-पावर कमेटियों की अध्यक्षता की है। इनमें एक कमेटी ऊपरी गंगा बेसिन में बांधों के प्रभाव को लेकर बनाई गई थी, जबकि दूसरी चारधाम परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को देखने के लिए गठित हुई थी।
उन्होंने कहा कि इन दोनों कमेटियों ने प्रभावित इलाकों का कई हफ्तों तक बड़े पैमाने पर दौरा किया था, ताकि पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को मौके पर जाकर समझा जा सके। चेयरमैन के तौर पर अपने अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने दोनों मामलों में अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की थी और दोनों ही मामलों में अदालत ने उस मांग को स्वीकार किया था।
डॉ. चोपड़ा ने कहा कि अरावली का मामला केवल पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ विषय नहीं है, बल्कि सबसे बढ़कर यह एक नैतिक मुद्दा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मानव समाज को अरबों साल पुरानी प्राकृतिक धरोहर को नष्ट करने का नैतिक अधिकार है?
उन्होंने कमेटी के सभी सदस्यों और चेयरमैन से अनुरोध किया कि 31 अगस्त की अंतिम रिपोर्ट सौंपने की तय समय-सीमा को बढ़ाया जाए, ताकि जमीनी स्तर पर विस्तृत अध्ययन किया जा सके।
100 मीटर की सीमा को लेकर वैज्ञानिक ने जताई चिंता
बैंगलुरु के अर्थ साइंटिस्ट डॉ. सीपी राजेंद्रन, जो फिलहाल वायनाड की पहाड़ियों में हाल ही में हुए भूस्खलन की जांच के लिए केरल सरकार द्वारा गठित टेक्निकल कमेटी में काम कर रहे हैं, ने भी अरावली को लेकर चिंता जाहिर की।
उन्होंने कहा कि भारत के पहाड़ी इलाकों पर शोध के वर्षों के अनुभव के आधार पर उन्हें विशेष रूप से चिंता है कि ऊंचाई के लिए प्रस्तावित 100 मीटर की सीमा के कारण कमजोर ढलान और बफर जोन खतरनाक व्यावसायिक खनन और रियल एस्टेट डेवलपमेंट की चपेट में आ सकते हैं।
डॉ. राजेंद्रन के मुताबिक, पश्चिमी घाट के लिए गठित गाडगिल कमेटी जैसी अधिक प्रतिनिधित्व वाली कमेटी अरावली से जुड़े अनसुलझे सवालों को हल करने के लिए एक आदर्श मॉडल हो सकती है।
माधव गाडगिल की अगुवाई वाली पश्चिमी घाट इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल ने पूरी पर्वत श्रृंखला को एक ही संवेदनशील इकोसिस्टम के रूप में देखते हुए संरक्षण का एक उदाहरण पेश किया था। इसकी सिफारिशें विज्ञान आधारित और बॉटम-अप फ्रेमवर्क पर आधारित थीं, जिसमें मजबूत पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ समुदाय के नेतृत्व वाले शासन को प्राथमिकता दी गई थी।
संरक्षण संगठनों ने भी समय बढ़ाने की मांग की

महाराष्ट्र और भारत के अन्य हिस्सों में प्रकृति संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था ‘वनशक्ति’ के डायरेक्टर स्टालिन दयानंद ने कहा कि पूरे भारत में संरक्षण समूह और जागरूक नागरिक इस कमेटी के काम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कमेटी से पुरजोर अपील है कि 31 अगस्त तक रिपोर्ट सौंपने की जल्दबाजी करने के बजाय वह और समय ले। बातचीत की प्रक्रिया को व्यापक बनाया जाए, स्वतंत्र विशेषज्ञों और संरक्षण संस्थाओं को शामिल किया जाए तथा ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की बात सुनी जाए।
स्टालिन दयानंद ने कहा कि कमेटी को व्यापक फील्ड विजिट करनी चाहिए और स्थानीय नागरिकों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए। अरावली की रक्षा करना आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
64 अरावली जिलों में व्यापक अध्ययन की मांग
इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन प्रैक्टिशनर प्रदीप कृषेन, जिन्होंने पिछले दो दशकों से दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के अरावली क्षेत्र में काम किया है, ने कहा कि इस कमेटी के पास अरावली रेंज के लिए ऐसा काम करने का ऐतिहासिक अवसर है, जो पहले कभी नहीं किया गया।
उन्होंने कहा कि अरावली के लिए ऐसी विस्तृत स्टडी की जरूरत है, जो सभी 64 अरावली जिलों को कवर करे। इनमें सितंबर 2025 की ‘फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट में बताए गए 63 जिले और उत्तर प्रदेश का मथुरा जिला शामिल है, जहां ब्रज भूमि की पहाड़ियां हैं और जिन्हें अरावली का हिस्सा माना जाता है।
प्रदीप कृषेन के मुताबिक, इस स्टडी को भरोसेमंद और वैज्ञानिक बनाने के लिए इसे एक या उससे अधिक प्रतिष्ठित स्वतंत्र संस्थाओं से कराया जाना चाहिए। इसमें इकोलॉजी, जियोलॉजी, पब्लिक हेल्थ, वाइल्डलाइफ और अन्य संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ऐसी व्यापक स्टडी से अरावली रेंज की कैरिंग कैपेसिटी की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। उत्तर भारत में स्वच्छ हवा और पानी की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण अरावली में बिना सोचे-समझे खनन करना, केवल पत्थर निकालने और विदेशों में मार्बल व ग्रेनाइट भेजने के लिए, किसी भी लिहाज से समझदारी नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह चिंता ऐसे समय में और गंभीर हो जाती है, जब भारत जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से प्रभावित देशों में शामिल है और गर्मी का स्तर तेजी से बढ़ रहा है।
अरावली के साथ राजनेताओं ने भी बुलंद की अपनी आवाज
अरावली के संरक्षण को लेकर राजनेताओं ने भी हाई पावर कमेटी की कार्यप्रणाली और फील्ड विजिट को लेकर सवाल उठाए हैं।
टीकाराम जूली ने पूछे तीन अहम सवाल
राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति को पत्र लिखकर तीन अहम सवाल उठाए हैं।
उन्होंने पूछा कि हाई पावर कमेटी ने राजस्थान के सभी प्रभावित जिलों का दौरा क्यों नहीं किया? अरावली के विनाश से सबसे अधिक प्रभावित लोगों के साथ अब तक सार्थक बातचीत क्यों नहीं की गई? और माइनिंग के कारण अपनी रोजी-रोटी को लेकर दर-दर भटकने वाले लोगों के गांवों का दौरा अब तक क्यों नहीं किया गया?

राजकुमार रोत बोले—जनसुनवाई का दायरा सीमित
लोकसभा सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि हाई-पावर कमेटी ने बातचीत के लिए जो प्रक्रिया अपनाई है, वह सुप्रीम कोर्ट के 25 मई 2026 के आदेश की भावना के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि उस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मुद्दों पर पक्की गाइडेंस देने और जरूरी अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए सभी जरूरी स्टेकहोल्डर्स को शामिल करने के बाद एक निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञ की राय ली जानी चाहिए और उस पर विचार किया जाना चाहिए।
राजकुमार रोत के मुताबिक, जनसुनवाई मुख्य रूप से गुड़गांव, अलवर, अजमेर और उदयपुर जैसे शहरों तक ही सीमित रह गई है। इसमें भी आदिवासी समुदायों की मौजूदगी बेहद कम रही है।
उन्होंने कहा कि ये समुदाय सदियों से अरावली रेंज में रहते आए हैं और अपनी जिंदगी के लिए वहां की पहाड़ियों, जंगलों और झरनों पर पूरी तरह निर्भर हैं। ऐसे में उनकी राय को प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व दिया जाना जरूरी है।
अमरा राम ने खनन प्रभावित गांवों का उठाया मुद्दा
उत्तरी राजस्थान से लोकसभा सांसद अमरा राम ने कहा कि यह निराशाजनक है कि कमेटी ने सीकर और कोटपूतली जिले के किसी भी खनन प्रभावित गांव का अब तक दौरा नहीं किया है।
उन्होंने कहा कि कमेटी को सीकर जिले के सलयोदरा गांव का भी दौरा करना चाहिए था, जहां पिछले कुछ वर्षों में सिलिकोसिस से 50 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
अमरा राम ने कहा कि सिलिकोसिस का प्रभाव केवल खदानों में काम करने वाले मजदूरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके आसपास रहने वाली आबादी भी इससे गंभीर रूप से प्रभावित होती है। इसलिए खनन प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति समझने के लिए कमेटी का मौके पर जाकर अध्ययन करना बेहद जरूरी है।
हरियाणा के ग्रामीण इलाकों की अनदेखी का आरोप
हरियाणा से कांग्रेस विधायक भारत भूषण बत्रा और किसान संघर्ष समिति के हरियाणा राज्य अध्यक्ष लोकेश भिवानी ने भी अरावली कमेटी को पत्र लिखकर हरियाणा के अरावली जिलों के ग्रामीण समुदायों की नाराजगी जाहिर की है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कमेटी की सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया में ग्रामीण समुदायों को पूरी तरह से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।
उनके मुताबिक, कमेटी ने गुड़गांव, फरीदाबाद और नूंह जिलों में अवैध माइनिंग, कचरा डंप करने और कचरा जलाने से प्रभावित किसी भी अरावली गांव का दौरा नहीं किया।
उन्होंने कहा कि दक्षिण हरियाणा के भिवानी, चरखी दादरी और महेंद्रगढ़ जिलों के उन इलाकों का भी दौरा नहीं किया गया, जो माइनिंग और स्टोन क्रशिंग गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित हैं।
इन नेताओं का कहना है कि ऐसे क्षेत्रों का जमीनी अध्ययन इसलिए भी जरूरी है, ताकि अरावली इकोसिस्टम के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सेहत और उनकी पारंपरिक आजीविका को हुए नुकसान का वास्तविक आकलन किया जा सके।
निष्कर्ष:
अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, ग्रामीणों, आदिवासी समुदायों और जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाई जा रही मांगों का मूल सवाल यही है कि क्या 31 अगस्त की समय-सीमा में इतनी व्यापक और संवेदनशील पर्वत श्रृंखला की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन संभव है? अब सबकी निगाहें हाई पावर कमेटी पर हैं कि वह इन आवाजों को कितना महत्व देती है और अपनी अंतिम रिपोर्ट में जमीनी हकीकत को किस तरह शामिल करती है।








