सरकार के पास पूरे राज्य में 1300 औषधीय पौधों का है महज आंकड़ा
- पतंजलि की पहल से पहली बार जनजातीय चिकित्सा ज्ञान का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, 216 पारंपरिक वैद्य सामने आए
- देहरादून, चमोली, पिथौरागढ़ और उधमसिंह नगर के गांवों में पहुंची शोध टीम, पीढ़ियों से संचित ज्ञान को किया संरक्षित
- ‘डॉक्यूमेंट ऑफ ट्राइबल हिल्स’ के रूप में संकलन, मौखिक परंपरा अब लिखित और वैज्ञानिक स्वरूप में आया
- देश में पहली बार पतंजलि ने जनजातीय समुदाय को जियो टैगिंग से किया मैपिंग, यह बड़ा कठिन और अनूठा कार्य रहा
हरिद्वार: उत्तराखंड में अब तक 1300 औषधीय पौधों का रिकॉर्ड मिलता है। लेकिन अकेले पतंजलि ने जनजातीय क्षेत्रों के महज पांच जिलों में अध्ययन करके 1011 पौधों को खोज निकाला। अब इससे भी आगे बढ़ते हुए पतंजलि के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की टीम उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में अन्य औषधीय पौधों की खोज में जुटी हुई है। प्रारंभिक स्तर पर टीम को सकारात्मक परिणाम मिले हैं और यह संख्या अब तक के 1300 औषधीय पौधों के सरकारी रिकॉर्ड को भी पार कर सकती है।
यह पहली बार होगा जब पूरे उत्तराखंड में औषधीय वनस्पतियों की नई तस्वीर सामने आ सकती है।
आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण के निर्देशन में उत्तराखंड के चार जिलों—देहरादून, चमोली, पिथौरागढ़ और उधमसिंह नगर—में शोध टीम गांव-गांव तक पहुंची। जनजातीय लोगों से जानकारी जुटाने के दौरान कई अहम तथ्य सामने आए। ऐसा लगा मानो जड़ी-बूटियों का छिपा खजाना मिल गया हो।
टीम ने पहाड़ों और तराई क्षेत्रों के 122 गांवों और 14 तहसीलों में जाकर उन लोगों से सीधा संवाद किया, जिनके पास पीढ़ियों से संचित पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान मौजूद है। इस अध्ययन में 216 जनजातीय वैद्यों की पहचान की गई, जिनकी उपचार पद्धतियां अलग-अलग थीं। हर वैद्य अपने आप में एक “ज्ञान का भंडार” साबित हुआ।
इन वैद्यों से बातचीत के दौरान 238 औषधीय पौधों का वैज्ञानिक आधार पर दस्तावेजीकरण किया गया। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले इन पौधों और उनके उपयोगों के बारे में आम दुनिया को बहुत कम जानकारी थी।
इस पहल में उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियों की भागीदारी भी सामने आई—
- जौनसारी – 39%
- भोटिया – 36%
- थारू – 10%
- बुक्सा – 9%
- वन राजी – 6%
अमूमन हर बीमारी का जनजातीय लोग कर रहे थे इलाज
पतंजलि टीम के अध्ययन के दौरान यह सामने आया कि जनजातीय समुदाय पेट दर्द, कोल्ड-कफ, कान-गला रोग, बुखार, मधुमेह, घाव-चोट, दांत दर्द, डायरिया, मलेरिया-डेंगू, पाइल्स, उल्टी-दस्त, अस्थमा, मुंह के छाले, हड्डियों को जोड़ना, किडनी में पथरी, आंखों की बीमारियों सहित कई रोगों का उपचार पारंपरिक तरीके से कर रहे थे।
इनमें सबसे अधिक उपचार जोड़ों के दर्द और अर्थराइटिस से संबंधित पाए गए।
देश में पहली बार जनजातियों की जियो टैगिंग डेटा भी पतंजलि ने किया
पतंजलि की टीम को पांच जिलों में जनजातीय समुदायों तक पहुंचने और जानकारी जुटाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। घुमंतू प्रवृत्ति वाले कई जनजातीय परिवारों का स्थायी निवास नहीं था, जिससे उनका डेटा जुटाना चुनौतीपूर्ण रहा।
इसी दौरान पतंजलि की टीम ने आदिवासी और जनजातीय परिवारों की जियो टैगिंग की, जो अब तक देश में कहीं नहीं की गई थी।
सरकारी आंकड़ों में जहां लगभग 50 हजार जनजातीय परिवारों की मौजूदगी बताई जाती रही, वहीं पतंजलि के अध्ययन में यह संख्या करीब 28 हजार सामने आई।
इसके अलावा पतंजलि ने जनजातीय परिवारों को कृषि, व्यवसाय और रोजगार से जोड़ने के लिए भी मंच उपलब्ध कराया। “अन्नदाता एप” के माध्यम से जनजातीय समुदायों को बिना किसी बिचौलिये के अपने उत्पाद बेचने का माध्यम दिया गया।
आचार्य बालकृष्ण का बयान
“जनजातीय समाज के पास प्रकृति और औषधीय वनस्पतियों का जो पारंपरिक ज्ञान है, वह मानवता की अमूल्य धरोहर है। पतंजलि ने उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों में पहुंचकर इस विलुप्त होती विरासत को वैज्ञानिक रूप से संरक्षित करने का कार्य शुरू किया है। अभी तक सीमित क्षेत्रों के अध्ययन में 1011 औषधीय पौधों की पहचान हो चुकी है और अब पतंजलि के वैज्ञानिकों की टीम पूरे 13 जिलों में नए औषधीय पौधों की खोज में दिन-रात जुटी है। प्रारंभिक परिणाम अत्यंत सकारात्मक हैं। आंकड़ों के पूर्ण संकलन के बाद उत्तराखंड में औषधीय वनस्पतियों की एक नई तस्वीर सामने आ सकती है। यह कार्य अत्यंत दुरुह और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन पतंजलि इसे जनजातीय समाज सहित अन्य के सहयोग से सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहा है।”









