पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मामले में चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने शीर्ष अदालत में रिट याचिका दाखिल कर SIR प्रक्रिया को मनमाना और लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
ममता बनर्जी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खतरा है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इससे आगामी चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री ने अपनी याचिका में कहा है कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जा रही SIR प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है। उनका तर्क है कि बिना पर्याप्त सूचना और उचित जांच के मतदाता सूची में बदलाव करना आम नागरिकों के मतदान अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
तृणमूल कांग्रेस की ओर से यह भी दावा किया गया है कि SIR प्रक्रिया का असर खासतौर पर गरीब, प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ सकता है, जिनके दस्तावेज अक्सर अधूरे या अस्थायी पते पर आधारित होते हैं।
वहीं, चुनाव आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाना है। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया नियमों के तहत की जा रही है और किसी भी योग्य मतदाता का नाम बिना कारण नहीं हटाया जाएगा।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका अहम मानी जा रही है। अदालत के फैसले से न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि अन्य राज्यों में चल रही मतदाता सूची संशोधन प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह मामला आने वाले चुनावों से पहले चुनाव आयोग और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों की सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।









