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फिल्म शुरू होने से पहले 22 मिनट विज्ञापन चलाना पड़ा भारी, हैदराबाद के थिएटर पर ₹75 हजार का जुर्माना

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हैदराबाद, 28 सितंबर 2026: फिल्म शुरू होने से पहले लंबे समय तक विज्ञापन और प्रमोशनल कंटेंट चलाना एक सिनेमा हॉल को महंगा पड़ गया। हैदराबाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक शिकायत पर सुनवाई करते हुए थिएटर को कुल ₹75,000 का भुगतान करने का आदेश दिया है।

आयोग ने माना कि व्यावसायिक विज्ञापनों और प्रमोशनल सामग्री के कारण फिल्म की शुरुआत में करीब 22 मिनट की देरी हुई और शिकायतकर्ता को इससे असुविधा हुई। आयोग ने थिएटर के इस व्यवहार को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार (unfair trade practice) के दायरे में माना।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 20 जून 2025 का है। हैदराबाद के एक 33 वर्षीय व्यक्ति ने धनुष और नागार्जुन अभिनीत फिल्म ‘कुबेर’ देखने के लिए दो टिकट बुक किए थे।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, शो का निर्धारित समय रात 10:35 बजे था। वह अपने दोस्त के साथ करीब 10:30 बजे थिएटर में अपनी सीट पर बैठ गया था।

लेकिन निर्धारित समय पर फिल्म शुरू नहीं हुई। शिकायत में कहा गया कि थिएटर में पहले विज्ञापन, ट्रेलर और अन्य प्रमोशनल सामग्री दिखाई जाती रही। यह सिलसिला करीब 10:52 बजे तक चलता रहा।

इस तरह फिल्म शुरू होने में लगभग 22 मिनट की देरी हुई।

देर से घर पहुंचने का भी किया दावा

शिकायतकर्ता ने आयोग के सामने कहा कि फिल्म शुरू होने में हुई देरी का असर उसके पूरे कार्यक्रम पर पड़ा। उसके अनुसार, उसे घर करीब रात 3 बजे पहुंचना पड़ा, जबकि वह लगभग एक घंटे पहले घर पहुंचने की उम्मीद कर रहा था।

उसने इस देरी को थिएटर की सेवा में कमी बताते हुए उपभोक्ता आयोग का रुख किया और मुआवजे की मांग की।

आयोग ने क्या फैसला सुनाया?

हैदराबाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मामले में अपना अंतिम आदेश 11 सितंबर 2026 को सुनाया।

आयोग ने शिकायतकर्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए थिएटर के व्यवहार को अनुचित व्यापार व्यवहार माना। आयोग के अनुसार, व्यावसायिक लाभ के लिए दिखाए जाने वाले विज्ञापन और प्रमोशनल कंटेंट के कारण दर्शक को निर्धारित समय पर फिल्म देखने का अनुभव प्रभावित हुआ।

सिर्फ विज्ञापन चलाने पर नहीं हुई कार्रवाई

इस मामले में यह समझना जरूरी है कि आयोग का फैसला केवल इस आधार पर नहीं था कि थिएटर में फिल्म से पहले विज्ञापन चलाए गए।

सुनवाई के दौरान थिएटर की ओर से दलील दी गई कि विज्ञापन, सार्वजनिक सेवा संदेश और फिल्म ट्रेलर उसके नियमित कारोबारी संचालन का हिस्सा हैं। थिएटर ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जागरूकता से जुड़े संदेश व्यापक जनहित में होते हैं।

हालांकि, आयोग ने मामले की परिस्थितियों में इस दलील को स्वीकार नहीं किया और व्यावसायिक विज्ञापनों तथा प्रमोशनल सामग्री से हुई देरी को शिकायतकर्ता के लिए सेवा में कमी माना।

सार्वजनिक जागरूकता फिल्मों को लेकर दिशानिर्देश का भी उल्लेख

आयोग ने अपने आदेश में सार्वजनिक सेवा और जागरूकता से जुड़ी फिल्मों की स्क्रीनिंग के संबंध में सरकारी दिशानिर्देशों का भी उल्लेख किया। इन दिशानिर्देशों के तहत स्वीकृत सार्वजनिक सेवा जागरूकता फिल्मों की अवधि दो मिनट तक सीमित होने का संदर्भ दिया गया।

हालांकि, आदेश का मुख्य आधार केवल इस अवधि का नियम नहीं था। आयोग ने विशेष रूप से व्यावसायिक विज्ञापनों और प्रमोशनल सामग्री से फिल्म शुरू होने में हुई देरी को मामले का महत्वपूर्ण पहलू माना।

₹75 हजार तीन हिस्सों में देने होंगे

आयोग ने थिएटर पर लगाए गए कुल ₹75,000 को तीन हिस्सों में बांटा है:

राशि किस लिए
₹20,000 शिकायतकर्ता को हुई असुविधा के मुआवजे के रूप में
₹5,000 मुकदमे की लागत के रूप में
₹50,000 जिला उपभोक्ता कल्याण कोष में दंडात्मक राशि के रूप में
कुल ₹75,000 आयोग के आदेश के अनुसार

₹50 हजार की दंडात्मक राशि क्यों?

आयोग ने ₹50,000 की राशि शिकायतकर्ता को देने के बजाय District Consumer Welfare Fund में जमा कराने का निर्देश दिया। यह राशि दंडात्मक प्रकृति की है और इसका उद्देश्य थिएटर को भविष्य में ऐसी व्यवस्था दोहराने से रोकना बताया गया है।

यह आदेश उपभोक्ता अधिकारों के उस पहलू को सामने लाता है जिसमें टिकट खरीदने वाले दर्शक को केवल फिल्म की सीट नहीं, बल्कि निर्धारित शो टाइम के अनुरूप सेवा मिलने की भी अपेक्षा होती है। हालांकि, इस आदेश की वास्तविक कानूनी सीमा और अन्य सिनेमाघरों पर इसका प्रभाव संबंधित नियमों और भविष्य के मामलों में अदालतों/उपभोक्ता आयोगों की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

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