भोर की पहली किरण और योगपीठ में एक अलग सा सुकूं

हरिद्वार: सुबह के करीब 6 बजे हैं। हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही है और योग भवन का पूरा प्रांगण अभी से साधकों और छोटे-छोटे बच्चों (बटुकों) से पट चुका है। सफेद कपड़ों में सजे इन बच्चों के चेहरों पर जो उत्सुकता है, उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है। हर कोई अपने गुरु का दीदार करना चाह रहा है। हवा में धूप और अगरबत्तियों की भीनी-भीनी खुशबू तैर रही है और पृष्ठभूमि में गूंजता ‘ॐ’ का जाप दिल को एक अजीब सा सुकून दे रहा है।
दिल को छू गया यह पल: माता जी के कदमों में गुरुजन
मंच पर एक बेहद खूबसूरत और भावुक करने वाला दृश्य देखने को मिला। स्वामी रामदेव अपनी पूज्य माता जी के चरण छूकर आशीर्वाद लेते हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। मंच पर आचार्य श्री भी होते हैं और वे स्वामी जी की माता जी से आशीर्वाद लेते हैं। यह पल देश-दुनिया को संदेश देता है कि जब देश के इतने बड़े व्यक्तित्व अपनी मां के चरणों में शीश नवाते हैं तो वहां मौजूद हर एक इंसान के लिए आज के दिन इससे बड़ा कोई और संदेश हो ही नहीं सकता था।
यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित; मंत्रों की गूंज से सिहर उठा शरीर

111 कुण्डीय महायज्ञ की शुरुआत हो चुकी है। जैसे ही यज्ञकुण्डों में आहुतियां डाली गईं, अग्नि की लाल-सुनहरी लपटें हवा में उठने लगीं।
हजारों हाथ एक साथ बैठकर ‘स्वाहा’ का उच्चारण कर रहे हैं। मंत्रों का यह स्वर इतना शक्तिशाली है कि योग भवन में खड़े किसी भी इंसान को गुरु से जोड़ दे। धुआं भले ही हवा में उठ रहा हो, लेकिन माहौल में एक गजब की पवित्रता और सकारात्मकता घुल गई है।
जब आचार्य शिरोमणि बालकृष्ण ने छुए स्वामी जी के चरण
गुरु-शिष्य का रिश्ता क्या होता है, इसका सीधा उदाहरण मंच पर देखने को मिला। आचार्य बालकृष्ण जी ने पूरे आदर के साथ स्वामी रामदेव जी के चरण स्पर्श किए। आचार्य श्री ने बहुत सहज शब्दों में कहा कि गुरु पूर्णिमा सिर्फ एक त्यौहार या रस्म नहीं है, यह तो हमारे भीतर के पुरुषार्थ को जगाने का दिन है। गुरु का हाथ सिर पर हो, तो जिंदगी की राह कभी मुश्किल नहीं लगती।
अपने बीच अपने गुरु को पाकर गदगद हुए बच्चे

संबोधन के बाद अब एक बहुत ही आत्मीय दृश्य दिख रहा है। स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण खुद बच्चों और साधकों के बीच घूम-घूमकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। स्वामी जी और आचार्य श्री उनके सिर पर हाथ रखकर दुलार कर रहे हैं। आज का यह दिन पतंजलि के इस प्रांगण में सिर्फ एक आयोजन बनकर नहीं रहा, बल्कि यादों का एक ऐसा कारवां बन गया है जो ताउम्र लोगों के दिलों में ताजा रहेगा।
स्वामी रामदेव का खरा सच: “रील्स और गानों के दीवाने मत बनो”

स्वामी रामदेव बटुकों के बीच घूमते आशीर्वाद देते हाथ में माइक लिये इस पावन पर्व पर बच्चों को सीख देते हैं। कुछ देर बाद वे मंच पर आते हैं फिर हमेशा की तरह बेबाक और सीधे अंदाज में नायक-नायिकाओं पर तंज कसते हैं। वे आज की पीढ़ी और रील्स संस्कृति पर बिना झिझक के अपनी बात रखते हैं।
स्वामी जी ने बड़े ही खरी-खरी अंदाज में कहा:
“आजकल हमने किसे नायक बना लिया है? जो परदे पर नाचते-गाते हैं, वे हमारे हीरो नहीं हो सकते। यह तो हमारी नादानी है कि हम नालायकों को नायक मान बैठे हैं! फिल्मों के संवाद और लफंगे गाने गुनगुनाना बंद कीजिए। जिस दिन हमारी जुबान पर वेदों के मंत्र होंगे, यह धरती खुद-ब-खुद खूबसूरत हो जाएगी।”
उन्होंने आगे कहा कि जो लोग हमारी परंपरा को ‘गुलामी’ कहते हैं, वे दरअसल खुद नशा, शराब और वासना के गुलाम हैं। हमारे असली हीरो तो हमारे घर में बैठे हमारे माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी हैं, जिनकी बदौलत आज हम इस मुकाम पर हैं।
अंतिम विचार
यह गुरु पूर्णिमा का आयोजन किसी धार्मिक अनुष्ठान, वैदिक मंत्र या भव्य तैयारी तक सीमित नहीं था। यह भारतीय परंपराओं की फिर से पुष्टि था, जो हमें याद दिलाती हैं कि जीवन का पहला स्कूल परिवार है, पहला गुरु माता-पिता हैं, और असली हीरो वह है जो अपने चरित्र, मूल्यों और सेवा के माध्यम से समाज का नेतृत्व करता है।
जब हम पतंजलि योगपीठ से वापस आए, तो एक विचार हमारे मन में बार-बार आ रहा था। यदि आने वाली पीढ़ियां अपने आदर्शों को चुनने में इस विवेक को सीख जाएं, तो समाज की दिशा वास्तव में बदल सकती है।








