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भारत की रक्षा खरीद नीति पर उठे सवाल, क्या ऑफसेट नीति अपने उद्देश्य पूरे कर पाई?

भारत ने पिछले दो दशकों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उद्देश्य से रक्षा ऑफसेट (Defence Offset) नीति लागू की थी। इस नीति का मकसद था कि विदेशों से खरीदे जाने वाले रक्षा उपकरणों पर होने वाले बड़े खर्च का एक हिस्सा भारत में निवेश, तकनीक हस्तांतरण, अनुसंधान और स्थानीय विनिर्माण के रूप में वापस आए। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति अपेक्षित परिणाम पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी। �

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ऑफसेट नीति का उद्देश्य भारतीय रक्षा उद्योग को मजबूत बनाना, आधुनिक तकनीकों तक पहुंच बढ़ाना और विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करना था। इसके तहत विदेशी रक्षा कंपनियों को भारत में उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास (R&D), तकनीकी सहयोग और निवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया। �

हालांकि कई विश्लेषकों का कहना है कि व्यवहार में अधिकांश मामलों में उन्नत तकनीक का पर्याप्त हस्तांतरण नहीं हो सका। कई विदेशी कंपनियों ने अपेक्षाकृत आसान विकल्पों के माध्यम से अपनी ऑफसेट जिम्मेदारियां पूरी कीं, जिससे भारतीय उद्योग को सीमित लाभ मिला।

हाल के वर्षों में भारत ने रक्षा खरीद नीति में बदलाव करते हुए स्वदेशी उत्पादन, स्थानीय विनिर्माण, बौद्धिक संपदा (IP) के स्वामित्व और ‘मेक इन इंडिया’ पर अधिक जोर देना शुरू किया है। नई रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) में भी घरेलू उद्योग की भागीदारी बढ़ाने और विदेशी निर्भरता कम करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

इस बीच संसद की एक समिति ने भी रक्षा ऑफसेट दायित्वों के प्रभावी क्रियान्वयन पर चिंता जताई है और लंबित दायित्वों की समयबद्ध समीक्षा तथा निगरानी को मजबूत करने की आवश्यकता बताई है।

रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि भारत को रक्षा उत्पादन में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना है, तो केवल स्थानीय असेंबली के बजाय अत्याधुनिक तकनीक, अनुसंधान क्षमता और स्वदेशी डिजाइन विकास पर अधिक निवेश करना होगा। इससे देश की रणनीतिक आत्मनिर्भरता और रक्षा उद्योग दोनों को दीर्घकालिक मजबूती मिल सकती है।

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