आयुर्वेद को कभी नकारने वाली एलोपैथिक कंपनियां अब खुद उसी राह पर, क्या स्वामी रामदेव की बात सही साबित हो रही है?

बीस साल एक लंबा वक्त होता है। इतने साल से स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण एक ही बात दोहरा रहे हैं। सिंथेटिक दवा को इलाज का इकलौता रास्ता मान लेना खतरनाक भूल है जबकि योग, आयुर्वेद और आहार-विहार से गंभीर से गंभीर बीमारियों को बिना किसी साइड इफेक्ट के ठीक किया जा सकता है।

अब एक दिलचस्प पहलू सामने आया है। फार्मा वर्ल्ड की दो बड़ी कंपनियां Lupin और Cipla आज अपने सबसे बिकाऊ प्रोडक्ट्स को खुद 100% Ayurvedic और Natural लिखकर बेच रही हैं। यहां सवाल लाजिमी हो जाता है कि जिस ऐलोपैथिक फार्मा इंडस्ट्री ने वर्षों तक योग-आयुर्वेद पर सवाल उठाए, वही आज चुपचाप उसी दिशा में क्यों मुड़ रही है?



आखिर एलोपैथिक वर्ल्ड को आयुर्वेद क्यों अपनाना पड़ा ?

गंभीर और जानलेवा बीमारियों में एलोपैथी को सिरे से नकारा नहीं जा सकता लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सिंथेटिक दवाओं के साइड इफेक्ट्स, ड्रग इंटरैक्शन और सालों चलने वाले कोर्स ने शरीर से अपनी कीमत वसूली है और अब जो तस्वीर उभरी है, वह चौंकाने वाली है। जिन जड़ी-बूटियों को कभी ‘मेनस्ट्रीम मेडिसिन’ के दायरे से बाहर रखा गया, वही हल्दी, इशबगोल, हरड़, मुलैठी, अश्वगंधा, शिलाजीत और आंवला अब बड़े फार्मा ब्रांड्स के फॉर्मूलेशन में लौट आए हैं।


Softovac की कहानी: Lupin खुद कह रही है 100% Natural

Softovac, Lupin का कंज्यूमर हेल्थकेयर ब्रांड है। 2017 में इसी प्रोडक्ट के जरिए कंपनी ने OTC सेगमेंट में कदम रखा था। दिलचस्प यह है कि Lupin इसे किसी सामान्य सिंथेटिक फॉर्मूलेशन की तरह पेश नहीं करती, वह खुद इसे इशबगोल, सोनामुखी, हरड़, मुलैठी, गुलाब दल, अमलतास और सौंफ से बना 100% natural bowel regulator बताती है।

दिसंबर 2023 में कंपनी ने Softovac Liquifibre भी उतारा, इसे भी 100% Ayurvedic liquid laxative बताते हुए, क्लिनिकली वैलिडेटेड एफिकेसी और सेफ्टी के दावे के साथ।

नतीजा सामने है। Lupin की अपनी FY 2025-26 इंटीग्रेटेड रिपोर्ट के मुताबिक, Softovac ने बल्क लैक्सेटिव्स कैटेगरी में 40% से ज्यादा मार्केट शेयर के साथ अपनी लीडरशिप बरकरार रखी है।

जरा सोचिए कि कब्ज जैसी मामूली समस्या के लिए एक ग्लोबल फार्मा कंपनी अपनी सबसे बड़ी कमाई उसी चीज़ से कर रही है, जिसे कभी ‘गैर-वैज्ञानिक’ कहकर हल्के में लिया गया था।


Curcucip: यहां भी हल्दी-काली मिर्च का जलवा

दूसरी मिसाल है Cipla की Curcucip। इसमें हल्दी (Curcuma longa) और काली मिर्च (Piper nigrum) के अर्क हैं, और कंपनी इसे proprietary Ayurvedic medicine के तौर पर लिस्ट करती है।

Cipla Health का Curcucip Plus Honey Ginger Sachet इससे एक कदम आगे है, इसमें 10% करक्यूमिन वाला Curcuma longa extract और 95% पिपेरिन वाला Piper nigrum extract डाला गया है। यह अब कोई पारंपरिक दावा नहीं, बल्कि नाप-तौल कर बनाया गया स्टैंडर्डाइज़्ड एक्सट्रैक्ट है।

इसे आयुर्वेद की ‘जीत’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना साफ है कि प्राकृतिक घटकों को अब लैब में उतनी ही संजीदगी से लिया जा रहा है, जितनी किसी सिंथेटिक मॉलिक्यूल को।


दिशा किसकी? श्रेय भले अभी न मिले

क्या Lupin और Cipla ने यह रास्ता स्वामी रामदेव को देखकर चुना ? इसका कोई सीधा प्रमाण नहीं है और यह जोड़ना जल्दबाजी होगी कि यह किसी एक अभियान का सीधा नतीजा है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिस दिशा की बात स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण बरसों से करते रहे हैं कि सिंथेटिक दवा इलाज का इकलौता विकल्प नहीं होनी चाहिए, बाजार का रुख आज उसी तरफ जाता दिख रहा है। यह एक संयोग भी हो सकता है, बड़े कंज्यूमर-हेल्थ ट्रेंड्स (नेचुरल, हर्बल प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग) का नतीजा भी।

स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की बात कभी किसी एक जड़ी-बूटी तक सीमित नहीं रही। उनका तर्क रहा है कि स्वास्थ्य को सिर्फ ‘बीमारी हुई-दवा ली-दब गई’ के फॉर्मूले तक समेटना गलत है, और योग, प्राणायाम, आहार व दिनचर्या को इलाज से पहले बचाव के स्तर पर शामिल किया जाना चाहिए।


आयुर्वेद अब दावे नहीं, सबूत पेश कर रहा है

आज जब बड़ी कंपनियां खुद अपने प्रोडक्ट को आयुर्वेदिक कहकर बेच रही हों, जब अश्वगंधा-शिलाजीत-गिलोय-पिप्पली मेनस्ट्रीम कंज्यूमर हेल्थ पोर्टफोलियो का हिस्सा बन चुके हों, तो प्राकृतिक चिकित्सा को सिर्फ ‘एलोपैथी विरोध’ कहकर खारिज करना उतना आसान नहीं रहा। फर्क बस इतना है कि आज की दुनिया सिर्फ दावे नहीं, सबूत मांगती है, क्लिनिकल ट्रायल्स, मानकीकरण, सेफ्टी डेटा, पीयर-रिव्यूड पब्लिकेशन्स। यही वह मैदान है जिस पर पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट पहले से उतर चुका है। पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन ने आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन्स पर जो क्लिनिकल ट्रायल्स और फार्माकोलॉजिकल स्टडीज़ खड़ी की हैं वे उसी भाषा में बात करती हैं जो मॉडर्न साइंस मांगती है, एविडेंस, मानकीकरण (standardization), पीयर-रिव्यूड डेटा।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. क्या बड़ी फार्मा कंपनियां वाकई आयुर्वेद अपना रही हैं?

कम-से-कम अपने कंज्यूमर-वेलनेस ब्रांड्स में हां। Lupin और Cipla जैसी कंपनियां natural और Ayurvedic extracts को अपनी बड़ी मार्केटिंग ताकत बना रही हैं।

2. क्या यह रामदेव के अभियान का सीधा असर है?

इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। पर यह दिखाता है कि बाजार का रुख भी उसी दिशा में जा रहा है, जिसकी वकालत वे दो दशक से करते आए हैं।


(यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध product information, कंपनी वेबसाइट और annual report डेटा पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है और न ही यह किसी कंपनी पर आरोप है।)

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