डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ कथित मारपीट के मामले में शिवसेना (शिंदे गुट) के पार्षद रमेश म्हात्रे को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिली। अदालत ने तत्काल जमानत देने से इनकार करते हुए मामले की जांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया और कहा कि जनप्रतिनिधियों से जनता सेवा की अपेक्षा करती है, न कि हिंसक व्यवहार की।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधि चुनाव के समय लोगों की सेवा का वादा कर वोट मांगते हैं, लेकिन चुने जाने के बाद यदि वही लोगों पर हमला करने लगें, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।
अदालत ने कहा कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा फाइल, कुर्सी या अन्य वस्तुओं से नागरिकों पर हमला करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है। न्यायालय ने इस मामले को गंभीर बताते हुए जांच की जिम्मेदारी संबंधित क्षेत्र के उप पुलिस आयुक्त (DCP) को सौंप दी।
DCP को सौंपी गई जांच
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि DCP जल्द से जल्द जांच अपने हाथ में लें और शिकायतकर्ता, पीड़ित डॉक्टरों, अस्पताल कर्मचारियों तथा अन्य गवाहों के बयान सुरक्षित माहौल में दर्ज कराएं। अदालत ने यह भी कहा कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए ताकि वे बिना किसी दबाव के अपना पक्ष रख सकें।
मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को तय की गई है, जिसमें जांच की प्रगति अदालत के सामने रखी जाएगी।
पुलिस की भूमिका पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने शुरुआती पुलिस कार्रवाई पर भी असंतोष जताया। न्यायालय ने कहा कि घटना के बाद प्रारंभिक जांच में अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं गई।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पुलिस का रवैया आरोपी के प्रति असामान्य रूप से नरम दिखाई दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि जिस तरह आरोपी को रिमांड के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश करने की अनुमति मांगी गई, उससे पुलिस के रवैये पर सवाल खड़े होते हैं।
वायरल वीडियो का अदालत ने किया उल्लेख
सुनवाई के दौरान अदालत ने कथित मारपीट के वायरल वीडियो का भी जिक्र किया। न्यायालय ने कहा कि वीडियो में आरोपी बिना किसी झिझक के लगातार डॉक्टर पर हमला करता दिखाई देता है।
बचाव पक्ष ने आरोपी की उम्र करीब 73 वर्ष बताते हुए राहत देने की मांग की, लेकिन अदालत ने कहा कि वीडियो देखकर ऐसा नहीं लगता कि वह उम्र के कारण कमजोर स्थिति में थे। अदालत की टिप्पणी थी कि वीडियो में आरोपी पूरी सक्रियता के साथ आक्रामक व्यवहार करते नजर आ रहे हैं।
अस्पताल में भर्ती होने पर भी उठे सवाल
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद आरोपी ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देकर अस्पताल में भर्ती होने की बात कही। हालांकि अदालत ने टिप्पणी की कि जिस समय कथित हमला हुआ, उस समय उनके व्यवहार से किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत नहीं मिलता था।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी अस्पताल से बाहर आए, जहां उनके समर्थकों ने उनका स्वागत किया।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, 6 जुलाई को ठाणे जिले के डोंबिवली स्थित एक नगर निगम अस्पताल में गर्भवती महिला के उपचार में कथित देरी को लेकर उसके परिजनों और पार्षद रमेश म्हात्रे के बीच विवाद हुआ। आरोप है कि इसी दौरान डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ मारपीट की गई।
मामले में निचली अदालत ने 15 जुलाई को आरोपी को जमानत दे दी थी। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उस जमानत आदेश पर रोक लगा दी और इसे गंभीर मामला बताया। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रमेश म्हात्रे ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और फिलहाल वे न्यायिक हिरासत में हैं।
बचाव पक्ष ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत से जमानत पर लगी रोक हटाने का अनुरोध किया। वकील ने कहा कि आरोपी जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं और यदि आवश्यक हुआ तो आरोपपत्र दाखिल होने तक महाराष्ट्र से बाहर रहने जैसी शर्त भी स्वीकार कर सकते हैं।
हालांकि, अदालत ने फिलहाल कोई राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।
मामले का महत्व
यह मामला केवल एक मारपीट की घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तथा कानून के समान अनुपालन जैसे व्यापक मुद्दों को भी सामने लाता है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद इस मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजर बनी हुई है।








