25 वर्षों तक देश के शीर्ष मीडिया घरानों और न्यूज़ चैनलों की दुनिया देखने के बाद, पतंजलि के दिव्य परिसर में बिताए एक साल की निष्पक्ष एवं भावपूर्ण दास्तान।
न्यूज़ रूम की धधकती दुनिया से माँ गंगा की गोद तक
तकरीबन 25 साल तक मैंने पत्रकारिता की मेन स्ट्रीम धधकती दुनिया को जिया है। अब भी यह किसी और रूप में जारी है। देश के प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों में वरिष्ठ पदों की ज़िम्मेदारी संभालने से लेकर लगभग दो सालों तक एक बड़े न्यूज़ चैनल के हेड के रूप में काम करने तक-मैंने सत्ता के गलियारों, सरकारी तंत्रों और कॉरपोरेट साम्राज्यों को बहुत करीब से देखा है। इस दौरान देश के कई बड़े संत-महात्माओं, उनके विशाल संगठनों और उनके सामाजिक-धार्मिक प्रकल्पों की अंदरूनी कार्यशैली को भी करीब से समझने और कवर करने का मौका मिला।
लेकिन, ज़िंदगी अक्सर वो मोड़ लेती है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती। कुछ पारिवारिक परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि मुझे न्यूज़ रूम की उस भागदौड़ भरी दुनिया को पीछे छोड़कर माँ गंगा की पावन नगरी हरिद्वार आना पड़ा। अपने परिवार के बीच लौटते हुए, मैं एक ऐसी जगह आ पहुँचा जहाँ केवल संस्थानों का निर्माण नहीं होता, बल्कि संस्कार, चरित्र, राष्ट्रहित, दृढ़-निश्चय और प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा को गढ़ा जाता है। योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में आज पूरी दुनिया जिस संस्थान का लोहा मानती है-जी हाँ, मैं उसी पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार की बात कर रहा हूँ-जहाँ पिछले एक वर्ष से मीडिया डिपार्टमेंट में एक छोटे से कार्यकर्ता के तौर पर कार्यरत हूँ।
यह 25 साल की पत्रकारिता के बाद पतंजलि अनुभव की मेरी सच्ची और निष्पक्ष यात्रा है।
एक पत्रकार की आँखें और पतंजलि की कड़वी-मीठी सच्चाई
एक पत्रकार की आँखें हमेशा संदेह, तर्क और निष्पक्षता की कसौटी पर सब कुछ परखने की आदी होती हैं। जब मैं पतंजलि आया, तो मेरे भीतर भी एक खोजी पत्रकार वाली जिज्ञासा और विश्लेषण का भाव था। लेकिन एक साल के इस सीधे अनुभव ने मेरे कई पूर्वाग्रहों को तोड़ दिया।
मैंने पाया कि गुरु पूर्णिमा पर साल में एक दिन दीप जलाना, मंचों से ओजस्वी भाषण देना या चरणों में फूल चढ़ाना ही गुरु-भक्ति नहीं है। पतंजलि के दिव्य परिसर में गुरु की सबसे बड़ी पूजा वह ‘मनुष्य’ है, जिसे वे अपने विचारों, कठोर अनुशासन और राष्ट्र-समर्पित तप से गढ़ते हैं। यहाँ शिष्य भाषणों से नहीं, गुरुओं के जीवन से सीखता है।
हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु महज एक ‘शिक्षक’ या केवल जानकारी (Information) देने वाला माध्यम नहीं है। गुरु वह दिव्य चेतना है जो व्यक्ति को अज्ञान के अंधकार से निकालकर कर्तव्य और आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश की ओर ले जाती है। आज का समाज जानकारी में तो बहुत समृद्ध है, लेकिन मूल्यों (Values) और आत्म-अनुशासन में निरंतर दरिद्र होता जा रहा है। ऐसे युग में प्राचीन गुरुकुल परंपरा का पुनरुद्धार कोई पुरानी मान्यता नहीं, बल्कि आज के समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
वैदिक परंपरा का आधुनिक स्पंदन
जब मैं पतंजलि के विशालकाय तंत्र, इसके अनुसंधान केंद्रों, चिकित्सालयों और शैक्षणिक संस्थानों को देखता हूँ, तो मुझे यह केवल एक विशाल कॉरपोरेट या व्यावसायिक संस्थान नजर नहीं आता। मुझे यहाँ एक जीवंत वैदिक परंपरा सांस लेती हुई महसूस होती है। आधुनिकता और अत्याधुनिक तकनीक की तमाम चकाचौंध के बीच भी पतंजलि के गुरुकुलों में प्राचीन ऋषियों का वही संकल्प, ओज और अनुशासन गूंजता है।
‘पतंजलि की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसने कितने हज़ार करोड़ का साम्राज्य खड़ा किया, बल्कि असली उपलब्धि यह है कि उसने भारत के करोड़ों नागरिकों के भीतर सोए हुए ‘आत्मसम्मान’, ‘स्वदेशी स्वाभिमान’ और ‘स्वास्थ्य-चेतना’ को पुनः जगा दिया।’
हर महान इतिहास की शुरुआत बहुत ही विनम्र होती है। पतंजलि की यह युगांतरकारी यात्रा भी दो निष्काम साधकों की अदभुत साझेदारी से शुरू हुई थी। वर्षों पहले जब उन्होंने इस पथ पर पहला कदम बढ़ाया था, तब शायद उन्होंने भी यह नहीं सोचा होगा कि उनकी यह तपस्या आगे चलकर विश्वभर के करोड़ों लोगों के जीवन में इतना बड़ा क्रांतिकारी बदलाव लाएगी।
दो साधक, दो संकल्प और एक अखंड राष्ट्र-यज्ञ
अपने पत्रकारिता के लंबे अनुभव के दौरान मैंने कई साझेदारियों को बनते और बिखरते देखा है, लेकिन स्वामी रामदेव जी और श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी का संबंध केवल दो व्यक्तियों की साझेदारी नहीं, बल्कि दो दूरदर्शी संकल्पों का संगम है:
1.
पूज्य स्वामी रामदेव जी ने यह ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ली कि वे योग को किसी एक वर्ग, आश्रम या गुफा तक सीमित न रखकर दुनिया के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएंगे। उन्होंने योग को टीवी स्क्रीन और मैदानों के ज़रिए जन-जन के प्रातःकाल का अभिन्न हिस्सा बना दिया। स्वामी जी ने योग के माध्यम से केवल शारीरिक आसनों की शिक्षा नहीं दी, बल्कि देश की सार्वजनिक चर्चा को ‘आत्मनिर्भरता’, ‘स्वदेशी’ और ‘भारतीयता’ के स्वाभिमान की ओर मोड़ दिया।
2.
श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी ने कैमरों की रोशनी से दूर रहकर भारतीय आयुर्वेद, दुर्लभ जड़ी-बूटियों के अनुसंधान, प्रामाणिक ग्रन्थों के पुनरुद्धार और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण को अपनी साधना बना लिया। उन्होंने दिन-रात के कठिन परिश्रम से प्राचीन आयुर्वेद को आधुनिक विज्ञान की वैश्विक कसौटी पर प्रामाणिक सिद्ध किया।
सफलता से बढ़कर ‘सेवा’ और ‘कर्तव्य’ का बोध
यदि कोई पतंजलि का मूल्यांकन केवल इसके योग शिविरों, पतंजलि उत्पादों, औषधालयों या टर्नओवर के आंकड़ों से करता है, तो वह इसके सबसे गहरे और पवित्र पक्ष को देखने में चूक जाता है। पतंजलि में कोई भी प्रवेश करे-चाहे वह विद्यार्थी हो, वैज्ञानिक हो या कर्मचारी-उसे सबसे पहले जिस चीज़ का अहसास होता है, वह है ‘कर्तव्य’ और ‘सेवा भाव’।
यहाँ सेवा को सफलता से ऊपर स्थान दिया जाता है। पतंजलि में देशभक्ति भाषणों में नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के रोज़मर्रा के काम में झलकती है। यहाँ कार्य करने वाला व्यक्ति स्वयं को महज एक सैलरी पाने वाला कर्मचारी नहीं मानता-वह महसूस करता है कि वह राष्ट्र-पुनर्निर्माण के एक महान यज्ञ में अपनी आहुति दे रहा है।
गुरु पूर्णिमा: आत्म-चिंतन और संकल्प का पर्व
गुरु पूर्णिमा केवल गुरु के प्रति औपचारिक कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर झांकने और आत्म-विश्लेषण करने का अवसर है। एक पत्रकार से साधक/कर्मयोगी बनने की इस यात्रा में, आज मैं स्वयं से ये प्रश्न पूछता हूँ:
- क्या हम केवल सूचनाएं जमा कर रहे हैं या गुरु की शिक्षाओं से अपने चरित्र का निर्माण कर रहे हैं?
- क्या हमारे भीतर निस्वार्थ सेवा और समर्पण का भाव बढ़ा है?
- क्या हम अपने परिवार, समाज और देश के प्रति अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील बने हैं?
- क्या हमने गुरु के दिखाए मार्ग पर चलकर अपने भीतर की सोई हुई चेतना को जगाया है?
सच्ची गुरु-परंपरा वह नहीं जो आपको केवल ज्ञान की भारी-भरकम बातें सिखाए, बल्कि वह है जो आपको जीवन को सही और निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखने की ‘दृष्टि’ प्रदान करे। आज गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर, मैं पूज्य स्वामी रामदेव जी और श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के चरणों में नमन करता हूँ-इसलिए नहीं कि उन्होंने कितना बड़ा आर्थिक साम्राज्य बनाया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने हम सभी को जीवन जीने का एक अनुशासित, स्वाभिमानी और दृष्टिकोण दिया है।
और अंत में…..एक नई शुरुआत और संतोष का सफर
योग ऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के ओजस्वी विचारों और आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन ने मेरे भीतर कुछ नया सीखने और पूरी निष्ठा से कार्य करने की एक अद्भुत प्रेरणा जगाई। जब मैंने इस संस्थान में कदम रखा था, तब कई चुनौतियाँ मेरे सामने थीं। शुरुआती दौर में ऐसा लगा कि यहाँ का माहौल मेरी कार्यशैली के अनुकूल नहीं है। परंतु, आचार्य श्री के निरंतर दिशा-निर्देशन और स्नेह ने मुझे संबल दिया। मुझे पता ही नहीं चला कि कब और कैसे मैंने उन शुरुआती असहजताओं को पीछे छोड़ दिया और अपने मूल लेखन स्वभाव व सृजन की दुनिया में लौट आया। आज स्थिति यह है कि मन में किसी प्रकार का संशय नहीं, बल्कि केवल संतोष और परम आनंद का भाव है। खूब लिखना चाहता हूं। खूब पतंजलि के बारे में हर दिन दुनिया को कुछ न कुछ बताना चाहता हूं।
लेखक:
नवीन पाण्डेय
(मीडिया, ब्रांडिंग एंड कम्युनिकेशन विभाग, पतंजलि योगपीठ फेज एक, दिशा बिल्डिंग)











