भारत-अमेरिका के प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (India-US Trade Agreement) के विरोध में दिल्ली की ओर कूच कर रहे पंजाब के सैकड़ों किसानों को मंगलवार को हरियाणा पुलिस ने शंभू बॉर्डर पर रोक दिया। किसान संगठनों का कहना है कि वे दिल्ली में प्रस्तावित किसान महापंचायत में शामिल होने जा रहे थे, लेकिन सीमा पर बैरिकेडिंग कर आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी गई।
शंभू बॉर्डर पर किसानों को रोके जाने के बाद वहां विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। किसान संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताते हुए केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों पर सवाल उठाए।
शंभू बॉर्डर पर फिर दिखा कड़ा सुरक्षा घेरा
किसानों के दिल्ली मार्च को देखते हुए शंभू सीमा पर व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई। सीमा पर बैरिकेड लगाए गए और पुलिस बल तैनात किया गया ताकि किसानों का जत्था हरियाणा में प्रवेश न कर सके।
यह दृश्य फरवरी 2024 के किसान आंदोलन की याद दिलाता है, जब दिल्ली की ओर बढ़ रहे किसानों को रोकने के लिए इसी सीमा पर कई स्तरों की सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का विरोध क्यों?
किसान संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, डेयरी, उद्योग, ई-कॉमर्स, निवेश, सेवाओं और बौद्धिक संपदा जैसे कई क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
उनका आरोप है कि यदि कृषि और डेयरी उत्पादों पर आयात संबंधी नियमों में ढील दी गई, तो अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाजार में अधिक मात्रा में आ सकते हैं। इससे छोटे और सीमांत किसानों की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
डेयरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता
किसान नेताओं का कहना है कि भारत का डेयरी क्षेत्र करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत है। उनका मानना है कि यदि विदेशी डेयरी उत्पादों की आसान एंट्री होती है, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दूध कारोबार, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि किसी भी व्यापार समझौते से पहले किसानों, डेयरी उत्पादकों, श्रमिक संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों से व्यापक चर्चा की जाए।
समझौते में पारदर्शिता की मांग
किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित व्यापार समझौते से जुड़े सभी दस्तावेज अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। उनका कहना है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर पारदर्शिता आवश्यक है ताकि सभी हितधारक संभावित प्रभावों को समझ सकें।
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि समझौते के मसौदे और उससे जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं तथा व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाए।
महापंचायत के जरिए सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं संदेश
विभिन्न किसान संगठनों के अनुसार, किसान महापंचायत का उद्देश्य सरकार के सामने अपनी चिंताओं को रखना और कृषि क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा की मांग करना है। इस कार्यक्रम में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कई किसान संगठनों के शामिल होने की योजना थी।
हालांकि शंभू बॉर्डर पर रोके जाने के बाद किसानों ने वहीं धरना शुरू कर दिया और कहा कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सरकार तक पहुंचाते रहेंगे।
कृषि नीति पर फिर तेज हुई बहस
शंभू बॉर्डर पर किसानों को रोके जाने की घटना के बाद एक बार फिर कृषि, व्यापार नीति और किसानों की आय से जुड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच संवाद की दिशा पर सभी की नजर रहेगी, क्योंकि यह मामला कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों को सामने ला रहा है।








