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छात्र को नोटिस देने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, पूछा- “मजिस्ट्रेट की इतनी हिम्मत कैसे हुई?”

कॉकroach जनरल पार्टी (CJP) के जुलाई में हुए विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होने के आरोप में एक छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि जब कोर्ट पहले ही छात्रों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तो गौतम बुद्ध नगर के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि उसके 1 सितंबर के आदेश में यह स्पष्ट था कि प्रदर्शन में शामिल होने वाले किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं की जा सकती। कोर्ट ने सवाल किया कि “मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी किया? हमारी तरफ से स्पष्ट आदेश था, फिर ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई?”

छात्र को 4 सितंबर को जारी हुआ था नोटिस

मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, उन्हें 4 सितंबर को गौतम बुद्ध नगर के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था।

नोटिस में छात्र पर कथित तौर पर सरकार विरोधी जानकारी फैलाने और अन्य छात्रों को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने का आरोप लगाया गया था।

हालांकि, अदालत को बताया गया कि यह नोटिस अगले ही दिन यानी 5 सितंबर को वापस ले लिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया गया हवाला

छात्र का मामला वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा। उन्होंने अदालत से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जाना जरूरी है।

उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को “भारत के छात्रों के साथ एक प्रयोग” बताया और अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि पहले ही स्पष्ट आदेश जारी किया जा चुका है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी मामले पर आश्चर्य जताया और कहा कि अदालत यह जानना चाहेगी कि जिला और कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से छात्र को नोटिस क्यों जारी किया गया।

1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किए थे मामले

इससे पहले 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए CJP विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी मामलों को खत्म करने का आदेश दिया था।

अदालत ने कहा था कि 20 से 25 जुलाई के बीच विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। इन मामलों में न तो जांच जारी रखी जाएगी और न ही उनके आधार पर आगे कोई कार्रवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि प्रदर्शन से संबंधित किसी भी मामले में छात्रों के खिलाफ भविष्य में नई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

“हम इस कार्रवाई से हैरान हैं”

मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत इस बात से हैरान है कि जब 1 सितंबर का आदेश बिल्कुल स्पष्ट था, तब किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया।

कोर्ट ने संकेत दिया कि वह संबंधित अधिकारियों से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगेगा। अब इस मामले में यह स्पष्ट किया जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद छात्र को नोटिस जारी करने की परिस्थितियां क्या थीं और जिम्मेदारी किसकी थी।

यह मामला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि अदालत के स्पष्ट आदेशों के बावजूद निचले स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई कैसे हुई।

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