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भारत के लिए बढ़ी रूसी तेल की चिंता: मध्य-पूर्व संकट और अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच रिफाइनरियों के सामने नई चुनौती

रूसी कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, सऊदी अरब की पाइपलाइन पर ड्रोन हमले और नवंबर के बाद की आपूर्ति को लेकर बढ़ी अनिश्चितता

नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की संभावित सख्ती के बीच भारत की सरकारी तेल रिफाइनरियों के सामने कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। व्यापार से सीधे जुड़े लोगों के अनुसार, पिछले कई महीनों के दौरान भारतीय रिफाइनरियों के लिए आपूर्ति से जुड़ी यह सबसे बड़ी अनिश्चितताओं में से एक है।

भारत लंबे समय से रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल और मध्य-पूर्व से होने वाली नियमित आपूर्ति पर निर्भर रहा है। इन दोनों स्रोतों पर दबाव बढ़ने से रिफाइनरियों को अब दूसरे देशों से तेल खरीदने के विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं। इससे आयात लागत बढ़ने और रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव पड़ने की आशंका है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा से आपूर्ति प्रभावित

मध्य-पूर्व में संघर्ष बढ़ने के बाद फरवरी के अंत से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। यह मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके जरिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है।

सऊदी अरब ने इस बाधा को कम करने के लिए अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का इस्तेमाल किया था। लेकिन पिछले सप्ताह ड्रोन हमलों के बाद इस महत्वपूर्ण वैकल्पिक मार्ग को बंद करना पड़ा। इससे भारत को होने वाली तेल आपूर्ति पर भी असर पड़ा और प्रतिदिन 4 लाख बैरल से अधिक तेल के प्रवाह में व्यवधान आया।

रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब पाइपलाइन के क्षतिग्रस्त हिस्से को बायपास करने के लिए काम कर रहा है। इससे कुछ दिनों में पाइपलाइन की करीब आधी क्षमता बहाल होने की उम्मीद है। हालांकि, आपूर्ति में यह राहत कितनी स्थायी होगी, यह क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति पर निर्भर करेगा।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका

मध्य-पूर्व से आपूर्ति में आई बाधाओं के बीच रूसी कच्चे तेल को लेकर भी भारतीय रिफाइनरियों की चिंता बढ़ गई है। व्यापार से जुड़े सूत्रों के अनुसार, रूसी तेल पहले ही प्रीमियम पर बिक रहा है और अमेरिका की नई प्रतिबंध नीति लागू होने की स्थिति में इसकी खरीद और मुश्किल हो सकती है।

अमेरिकी कांग्रेस ने बुधवार को रूस के खिलाफ व्यापक प्रतिबंध विधेयक को मंजूरी दी है। यह विधेयक रूस के तेल उद्योग के साथ कारोबार करने वाले देशों पर दंडात्मक शुल्क लगाने का रास्ता खोलता है। अब इस दिशा में आगे की कार्रवाई और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख पर नजर बनी हुई है।

यदि भारत से जुड़े तेल कारोबार पर अतिरिक्त शुल्क या अन्य प्रतिबंध लागू होते हैं, तो सरकारी रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल खरीदना अधिक महंगा और जटिल हो सकता है।

सितंबर और अक्टूबर की जरूरत पूरी, नवंबर के बाद की चिंता

व्यापार से जुड़े लोगों के अनुसार, भारत की सरकारी तेल रिफाइनरियों ने सितंबर और अक्टूबर की कच्चे तेल की जरूरत के लिए आपूर्ति सुरक्षित कर ली है। लेकिन नवंबर और उसके बाद की अवधि के लिए खरीद संबंधी फैसले अधिक कठिन हो रहे हैं।

रिफाइनरियों को एक ओर कच्चे तेल की नियमित आपूर्ति बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर खरीद की लागत और संभावित प्रतिबंधों का भी ध्यान रखना होगा। मध्य-पूर्व से आपूर्ति बाधित होने और रूसी तेल पर अनिश्चितता बढ़ने से उन्हें दूर के बाजारों से तेल खरीदना पड़ सकता है।

इसका असर उन रिफाइनरियों के मुनाफे पर पड़ सकता है, जो उत्पादन कम किए बिना पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसे उत्पादों की बिक्री जारी रखती हैं। इन उत्पादों की कीमतें कई बार लागत से कम रहने पर रिफाइनिंग कंपनियों का मार्जिन और दबाव में आ सकता है।

भारत ने अमेरिका, ब्राजील और अन्य देशों से बढ़ाई खरीद

भारत समुद्र के रास्ते आने वाले रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। हालांकि, आपूर्ति में अनिश्चितता बढ़ने के साथ भारतीय रिफाइनरियां पहले से ही अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, वेनेजुएला और अफ्रीकी देशों से अतिरिक्त तेल खरीद रही हैं।

इस विविधीकरण का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करना है। लेकिन व्यापार से जुड़े लोगों के अनुसार, अलग-अलग देशों से तेल मंगाने पर परिवहन लागत, बीमा और अन्य खर्च बढ़ सकते हैं। इससे सस्ता कच्चा तेल खरीदकर घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पाद बेचने की रणनीति पर असर पड़ सकता है।

भारत का कच्चे तेल का भंडार मई के बाद सबसे निचले स्तर पर

ऊर्जा बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 14 सितंबर से शुरू हुए सप्ताह में भारत का कच्चे तेल का भंडार घटकर 9.35 करोड़ बैरल रह गया। यह मई के बाद का सबसे निचला स्तर बताया गया है।

Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा भंडार भारत की करीब 20 दिनों की आयात जरूरत के बराबर है। ऐसे समय में जब मध्य-पूर्व से आपूर्ति प्रभावित है और रूसी तेल को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है, भंडार में गिरावट रिफाइनरियों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।

हालांकि, तेल भंडार की स्थिति में बदलाव आयात, घरेलू खपत, रिफाइनरी संचालन और आपूर्ति मार्गों पर निर्भर करता है। इसलिए मौजूदा आंकड़े भविष्य की उपलब्धता का निश्चित अनुमान नहीं देते।

राजस्थान की नई रिफाइनरी से बढ़ेगी कच्चे तेल की जरूरत

भारत में रिफाइनिंग क्षमता के विस्तार के कारण आने वाले महीनों में कच्चे तेल की मांग बढ़ने की संभावना है। राजस्थान में प्रतिदिन 1.80 लाख बैरल क्षमता वाली नई रिफाइनरी का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है।

इसके अलावा, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) अपनी मौजूदा रिफाइनरियों का विस्तार कर रही है। कंपनी दिसंबर तक प्रतिदिन 3.40 लाख बैरल से अधिक अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की योजना पर काम कर रही है।

नई और विस्तारित रिफाइनरियों के संचालन से भारत की कच्चे तेल की जरूरत बढ़ेगी। ऐसे में आपूर्ति मार्गों में बाधा और आयात लागत में बढ़ोतरी का असर तेल कंपनियों की खरीद रणनीति पर पड़ सकता है।

आगे की स्थिति किन बातों पर निर्भर करेगी?

भारत की तेल आपूर्ति पर आगे पड़ने वाला असर कई कारकों से तय होगा। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन की स्थिति, सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की बहाली, रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों का स्वरूप और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें शामिल हैं।

इसके अलावा, भारतीय रिफाइनरियों द्वारा अमेरिका, ब्राजील और अन्य देशों से की जा रही खरीद कितनी तेजी से बढ़ती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि वैकल्पिक स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति मिलती है, तो रिफाइनरियां मौजूदा संकट का सामना करने में सक्षम हो सकती हैं। लेकिन यदि आपूर्ति बाधाएं लंबे समय तक जारी रहती हैं, तो आयात लागत और रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।

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