महाशिवरात्रि विशेष: पतंजलि योगपीठ में भक्ति के साथ सेवा का अनूठा संगम, हजारों कांवड़ियों को रोजाना मिल रहा प्रसाद
हरिद्वार: सावन में हर तरफ ‘हर-हर महादेव’, ‘बोल बम’ और ‘जय भोले’ के जयकारे। कंधों पर कांवड़, कांवड़ वाहनों की रफ्तार, चेहरे पर उत्साह और मन में भोलेनाथ की भक्ति। इसी आस्था के बीच हरिद्वार के पतंजलि योगपीठ की ओर से पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन के करीब कांवड़ियों की सेवा का एक ऐसा दृश्य दिखाई दिया, जिसने भक्ति को सेवा से जोड़ दिया।
ओसवाल पंप्स एंड सोलर की ओर से पतंजलि योगपीठ में कांवड़ियों के लिए निशुल्क भंडारे और सेवा की व्यवस्था की गई है। यहां रोजाना हजारों भोले प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं। जैसे-जैसे कांवड़ियों की संख्या बढ़ रही है, सेवा का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। भोजन से लेकर चाय, नमकीन, जलेबी, हलवा और मेडिकल सुविधा तक-हर व्यवस्था में शुद्धता, स्वच्छता और अपनत्व का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
सबसे खास बात यह रही कि इस सेवा में स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण स्वयं शामिल हुए। उन्होंने केवल भंडारे का निरीक्षण ही नहीं किया, बल्कि खुद पूड़ियां तलीं, जलेबी बनाई, कांवड़ियों को प्रसाद परोसा और उनसे आत्मीय संवाद भी किया।

जब कांवड़ियों के बीच पहुंचे स्वामी रामदेव
भंडारे में कांवड़ियों की भीड़ के बीच जब स्वामी रामदेव पहुंचे तो माहौल और भी आनंदमय हो गया। कोई उनके साथ फोटो खिंचवाने लगा तो कोई सेल्फी लेने लगा। स्वामी रामदेव भी पूरी सहजता के साथ कांवड़ियों के बीच घुल-मिल गए।
गुलाब की पंखुड़ियों से कांवड़ियों का स्वागत हो रहा था। सेवा में लगे लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ भोलेनाथ के भक्तों पर गुलाब की पंखुड़ियां बरसा रहे थे। स्वामी रामदेव ने भी कांवड़ियों के साथ इस आनंद में सहभागिता की।
वे कांवड़ियों से पूछते रहे- ‘भोले, कहां से आए हो?’
किसी ने दिल्ली बताया तो स्वामी रामदेव ने कहा- ‘आनंद करो, भोलेनाथ का नाम लो और यात्रा का आनंद लो। नशा-पत्ती मत करना। सबको प्रसाद मिलेगा।’
उनका अंदाज बिल्कुल अपनापन लिए हुए था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी धार्मिक आयोजन में संत और भक्त के बीच नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के सदस्यों के बीच संवाद हो रहा हो।
कड़ाही में खौलता देशी घी और बनने लगी हरियाणवी कड़क पूड़ी

भंडारे की रसोई में बड़े पैमाने पर भोजन तैयार हो रहा था। कहीं आलू की सब्जी बन रही थी, कहीं पूड़ियां तली जा रही थीं और कहीं हलवा तथा जलेबी तैयार हो रही थी।
स्वामी रामदेव खुद रसोई में पहुंचे और पूड़ी तलने लगे।
कड़ाही में देशी घी की गर्माहट, सामने तैयार होते आटे की लोइयां और सेवा में जुटे हलवाई-पूरा दृश्य किसी बड़े पारिवारिक उत्सव जैसा दिखाई दे रहा था।
स्वामी रामदेव ने मजाकिया अंदाज में इसे ‘हरियाणवी कड़क पूड़ी’ भी कहा। कांवड़ियों के लिए भोजन तैयार करने में पतंजलि के शुद्ध देशी घी, तेल और आटे का इस्तेमाल किया जा रहा है।
भंडारे में भोजन की मात्रा भी सामान्य नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर है। हलवा टनों के हिसाब से तैयार किया जा रहा है, जिसमें काजू, किशमिश सहित अन्य सामग्री डाली जा रही है।
स्वामी रामदेव ने खुद बनाई जलेबी, बोले- ‘गरमा-गरम माल है’ भंडारे में जलेबी बन रही थी। स्वामी रामदेव ने खुद जलेबी बनाने की जिम्मेदारी संभाल ली।
गरम कड़ाही में जलेबी उतरती रही और देखते ही देखते कांवड़ियों के बीच इसे लेकर उत्साह बढ़ गया।
स्वामी रामदेव ने अपने हाथों से बनाई जलेबी लेकर कांवड़ियों को खिलाई। एक भोले ने उनसे कहा- ‘स्वामी जी, एक दे देना।’
इस पर स्वामी रामदेव ने हंसते हुए कहा- ‘एक क्या, दो ले ले।’
कांवड़ियों के लिए उनका यह सहज अंदाज खूब पसंद आया।
एक बच्चे को जलेबी देते हुए उन्होंने प्यार से कहा कि इसे बाबूजी को भी खिलाना। फिर कांवड़ियों से बोले- ‘गरमा-गरम है, धीरे-धीरे खाना, वरना जीभ जल जाएगी।’
सेवा के बीच हंसी-मजाक, अपनापन और भक्ति का यह संगम पूरे वातावरण को आनंद से भर रहा था।
‘भोले की बरात’ जैसी खातिरदारी

भंडारे में कांवड़ियों की खातिरदारी भी बेहद आत्मीय अंदाज में हो रही थी। स्वामी रामदेव ने कहा कि यह भोलेनाथ की बरात है और कांवड़िये भोले के भक्त हैं।
उन्होंने कांवड़ियों से कहा कि यहां किसी को निमंत्रण देकर नहीं बुलाया जाता-
‘जो आता है, वो पाता है।’
सुबह छह बजे से चाय की सेवा शुरू हो जाती है। सुबह बूंदी, नमकीन और चाय से सेवा का सिलसिला शुरू होता है और करीब 10 बजे से पूरा भंडारा शुरू हो जाता है, जो रात करीब 11 बजे तक चलता है।
देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग सेवा करने पहुंच रहे हैं। कनाडा से बेटियां भी इस सेवा में शामिल होने पहुंचीं और कांवड़ियों को जलेबी, हलवा और पूड़ी परोसती नजर आईं।
कांवड़ियों के लिए भोजन ही नहीं, स्वास्थ्य सेवा भी
भंडारे में केवल भोजन की व्यवस्था नहीं है। कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भोले की तबीयत खराब हो जाए या किसी को चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता पड़े, इसके लिए मेडिकल सेवा भी उपलब्ध है।
पतंजलि क्रिटिकल हॉस्पिटल के चिकित्सक और मेडिकल स्टाफ भी सेवा में जुटे हैं।
फिर पहुंचे आचार्य बालकृष्ण-खुद तली पूड़ियां, खुद परोसा प्रसाद

सेवा का यह सिलसिला आगे बढ़ा तो आचार्य बालकृष्ण भी भंडारे में पहुंचे।
उन्होंने भी केवल व्यवस्था को देखा नहीं, बल्कि सीधे सेवा में जुट गए। आचार्य बालकृष्ण ने स्वयं पूड़ियां तलीं और कांवड़ियों को प्रसाद परोसा।
कांवड़ियों के बीच जाकर वे लगातार उनसे संवाद करते रहे-
‘भोले, कहां से हो?’
फिर पूछा- ‘प्रसाद ले लिया?’
कांवड़ियों के चेहरे पर संतोष देखकर उन्होंने पूछा कि भोजन कैसा लगा।
एक भोले ने जवाब दिया-
‘घर से भी अच्छा है।’
आचार्य बालकृष्ण मुस्कुराए और फिर दूसरे कांवड़ियों को प्रसाद परोसने में जुट गए।
रोजाना हजारों भोले, लाखों तक पहुंचेगा सेवा का सिलसिला

भंडारे में रोजाना बड़ी संख्या में कांवड़िये प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं। 15 से 20 हजार लोगों के प्रसाद ग्रहण करने से शुरू हुआ भंडारा आज 30 से 40 हजार लोगों तक प्रतिदिन पहुंच रहा है।
यानी सावन और कांवड़ यात्रा के पूरे पर्व के दौरान लाखों भोले इस भंडारे का प्रसाद ग्रहण करेंगे।
भोजन बनाने के लिए बड़ी संख्या में हलवाई दिन-रात जुटे हैं। करीब 29 हलवाई लगातार कई घंटे तक भोजन तैयार करने में लगे हैं। लगभग 15 घंटे तक रसोई में सेवा का सिलसिला चलता है।
शुद्धता पर पूरा जोर-देशी घी से लेकर आटे तक पतंजलि की सामग्री
इस भंडारे की एक खास पहचान भोजन की गुणवत्ता और शुद्धता है।
पूड़ी, हलवा, सब्जी और अन्य व्यंजन तैयार करने में पतंजलि के शुद्ध देशी घी, तेल और आटे का इस्तेमाल किया जा रहा है। भोजन तैयार करने से लेकर परोसने तक स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
सेवा में लगे लोगों का कहना है कि कांवड़ियों को प्रसाद उपलब्ध कराना ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि उन्हें स्वच्छ, गुणवत्तापूर्ण और स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर भोजन उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भंडारे की रसोई में सफाई और स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
प्लास्टिक नहीं, पत्तल में प्रसाद-पर्यावरण का भी ध्यान
भोजन की व्यवस्था में पर्यावरण का भी ख्याल रखा गया है।
कांवड़ियों को प्रसाद प्लास्टिक की प्लेट या प्लास्टिक के बर्तनों में देने के बजाय पत्तल में परोसा जा रहा है।
सेवा के इस पूरे आयोजन में यह संदेश भी दिखाई देता है कि धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी को भी निभाया जा सकता है।
‘जितना बन पड़े, जीवन में सेवा करिए’
आचार्य बालकृष्ण ने कांवड़ियों को प्रसाद परोसते हुए सेवा के महत्व का संदेश भी दिया।
उनका कहना था कि जीवन में जितना संभव हो, सेवा करनी चाहिए। किसी के काम आना ही जीवन की सार्थकता है।
इधर स्वामी रामदेव भी कांवड़ियों के बीच लगातार यही भाव पैदा करते नजर आए-भोलेनाथ की भक्ति केवल जयकारे तक सीमित न रहे, बल्कि सेवा, सद्भाव और संयम में भी दिखाई दे।
सेल्फी के लिए उमड़े कांवड़िये
स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के साथ आत्मीय मुलाकात के बाद कांवड़ियों में उनके साथ फोटो और सेल्फी लेने का उत्साह भी दिखाई दिया।
कांवड़िये उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए उमड़ पड़े। स्वामी रामदेव ने भी किसी को निराश नहीं किया और पूरे उत्साह के साथ कांवड़ियों के साथ संवाद करते रहे।
एक तरफ हाथ में कांवड़, दूसरी तरफ प्रसाद की थाली और बीच में संतों के साथ फोटो-कांवड़ियों के लिए यह यात्रा का यादगार अनुभव बन गया।
भक्ति भी, सेवा भी और अपनापन भी
पतंजलि योगपीठ में चल रहा यह भंडारा सिर्फ भोजन वितरण का आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा, शुद्धता और अपनत्व का संगम बन गया है।
जहां एक ओर हजारों भोले हर दिन प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण स्वयं रसोई और भंडारे में उतरकर सेवा का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
स्वामी रामदेव का जलेबी बनाना, खुद पूड़ी तलना, कांवड़ियों को अपने हाथों से जलेबी खिलाना और उनके साथ हंसी-मजाक करना हो या आचार्य बालकृष्ण का पूड़ी तलकर प्रसाद परोसना—इन दृश्यों ने सेवा को एक अलग ही आत्मीयता दे दी।
यहां कोई औपचारिकता नहीं, कोई निमंत्रण नहीं—“जो आता है, वो पाता है।”
कहीं गुलाब की पंखुड़ियों से भोले का स्वागत हो रहा है, कहीं देशी घी में पूड़ियां तली जा रही हैं, कहीं टनों के हिसाब से हलवा तैयार हो रहा है, कहीं गरमा-गरम जलेबी बन रही है और कहीं चिकित्सक कांवड़ियों की सेवा में खड़े हैं।
चारों ओर एक ही स्वर गूंज रहा है—

हर-हर महादेव!
बोल बम!
जय भोले!
बोलो शंकर भगवान की जय!
और इसी जयकारे के बीच पतंजलि योगपीठ में कांवड़ियों की सेवा का यह सिलसिला लगातार जारी है। 11 अगस्त महाशिवरात्रि के साथ भंडारे का सिलसिला फिर अगले बरस भोलों की सेवा तक थम जाएगा।








